Monday, June 17, 2013

संघl और राजनीति from M G Vaidya



संघ और राजनीति


'संघ और राजनीति' इस शीर्षक का लेख लिखने के लिए मुझे प्रवृत्त किया, दि. 13 जून के 'इंडियन एक्सप्रेस' इस विख्यात अंग्रेजी दैनिक के संपादकीय लेख ने. 'इंडियन एक्सप्रेस' के उस लेख का शीर्षक है "Coming Out". हिंदी में उसका अनुवाद होगा 'प्रकटीकरण'. और भी एक कारण घटित हुआ. वह यह की 13 जून को ही  Times Now चॅनेल के मुंबई के प्रतिनिधि मुझसे मिलने आये और उन्होंने 'संघ और राजनीति' इस विषय पर मेरी मुलाकात ली. रविवार 16 जून को, 'टाईम्स नाऊ' एक घंटे की 'पॉलिटिक्स' शीर्षक से चर्चा प्रसारित करनेवाला है. उस संदर्भ में ही यह मुलाकात थी.


लेख का कारण

'इंडियन एक्सप्रेस'के संपादकीय का मथितार्थ ऐसा है की संघ खुलकर राजनीति में उतरे. संघ ने स्वयं के बारे में अराजनीतिक होने की काल्पनिक कहानी (fiction) त्याग देनी चाहिए. भाजपा के लिए नागपुर (अर्थात् रा. स्व. संघ) वैसे ही है जैसे काँग्रेस के लिए 10 जनपथ (अर्थात् श्रीमती सोनिया गांधी का निवासस्थान) है. संघ को उपदेश देने का अधिकार सभी को है. इस कारण 'इंडियन एक्सप्रेस'ने ऐसा लिखने में अनुचित कुछ भी नहीं. लेकिन, इस उपदेश से, संघ के बारे में उनका अज्ञान और संभ्रम ही प्रकट होता है, यह वे भी विचारपूर्वक ध्यान में ले, इसलिए यह लेखप्रपंच.


'राष्ट्र' का अर्थ

यह सच है कि, संघ मतलब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, यर्थाथ में समझ लेना कुछ कठिन है. कारण सार्वजनिक जीवन में जो अनेक संस्था कार्यरत है, उनके ढाँचे में संघ नहीं बैठता. लोगों के ध्यान में यह नहीं आता कि, संघ संपूर्ण समाज का संगठन है. समाजांतर्गत एक संगठित टोली नहीं. समाज व्यामिश्र (complex) होता है. मतलब उसने जीवन के अनेक क्षेत्र होते है. राजनीति या राजनीतिक क्षेत्र उनमें से एक क्षेत्र है. एकमात्र क्षेत्र नहीं. धर्म. शिक्षा, अर्थ, श्रम, उद्योग, कृषि, आरोग्य, विज्ञान, साहित्य, ऐसे अनेक क्षेत्र है. उसी प्रकार वनवासी, मजदूर, विद्यार्थी, शिक्षक, अधिवक्ता, डॉक्टर-वैद्य, आदि अपने समाज के विविध घटक है. संपूर्ण समाज के संगठन का अर्थ इन सब समाजक्षेत्रों और समाजघटकों का संगठन. इसका ही नाम राष्ट्रीय संगठन है. कारण राष्ट्र मतलब केवल राज्यव्यवस्था नहीं होता. राष्ट्र मतलब लोग है. People are the Nation यह सब को पता ही है.


सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

किस जनसमूह का राष्ट्र बनता है, इसके बारे में कुछ निश्‍चित धारणाएँ है. मुख्य तीन धारणाएँ है. (1) जिस देश में हम रहते है, उस भूमि के विषय में हमारी भावना. (2) हमारा पूर्वजों के संबंधी ज्ञान और उनके साथ हमारा संबंध और उस जनसमूह का जो इतिहास होता है, वह उस समूह को अपना इतिहास लगना चाहिए. इतिहास में सब विजय और अभिमान के ही प्रसंग होते है, ऐसा नहीं. पराजय और लज्जा के भी प्रसंग होते है. वह सबको अपने यशापयश और अभिमान-लज्जा के प्रसंग लगने चाहिए (3) और सबसे महत्त्व की बात यह है कि, अच्छा-बुरा तय करने के समाज के मापदंड; मतलब उसकी मूल्यधारणा  (Value system). यह मूल्यधारणा मतलब संस्कृति होती है; और संघ इसे अपने राष्ट्रीयत्व का आधार मानता है. इस कारण हम कहते है कि, हमारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है. ऊपर बताई तीन धारणाएँ धारण करनेवाले लोगों का सर्वपरिचित नाम 'हिंदू' होने के कारण यह हिंदूराष्ट्र है. हिंदू एक रिलिजन या मजहब नहीं. अनेक रिलिजन्स को अपने में समा लेनेवाला वह एक महासागर है. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् या अन्य किसी ने कहा है कि,  Hinduism is not a religion, it is a commonwealth of many religions. हम 'धर्म' शब्द का अनुवाद 'रिलिजन' करते है. इस कारण बहुत बड़ा वैचारिक संभ्रम निर्माण होता है. हमारे नित्य के व्यवहार में के कुछ शब्द लें, जैसे धर्मशाला, धर्मार्थ दवाखाना, धर्मकाटा, राजधर्म, पितृधर्म इत्यादी और इन सब शब्दों के 'धर्म' शब्द के लिए 'रिलिजन' या 'रिलिजस' विकल्प का प्रयोग करके देखे और जो मजा आएगी उसका आनंद लें.


अर्नेस्ट रेनाँ का प्रतिपादन

यहाँ मुझे अर्नेस्ट रेनाँ इस फ्रेंच लेखक का वचन उद्धृत करने का मोह होता है. वह वचन है.

"The soil provides the substratum, the field for struggle and labour, man provides the soul. Man is everything in the formation of this sacred thing that we call a people. Nothing that is material suffices here. A nation is a spiritual principle, the result of the intricate workings of history, a spiritual family and not a group determined by
the configuration of the earth."

रेनाँ आगे कहता है

"Two things which are really one go to make this soul or spiritual principle. One of these things lies in the past, the other in the present. The one is the possession in common of a rich heritage of memories and the other is actual agreement, the desire to live together and the will to make the most of the joint inheritance. Man cannot be improvised. The nation like the individual is the fruit of a long past spent in toil, sacrifice and devotion."
तात्पर्य यह कि संघ का रिश्ता संपूर्ण राष्ट्रकारण से है; और राजनीति भी राष्ट्रकारण का ही एक अंश होने के कारण राजनीति से भी उसका संबंध है. वह आज का नहीं. बहुत पुराना है. संघ जिन्होंने स्थापन किया उन डॉ. हेडगेवार जी ने संघस्थापना के बाद सन् 1930 में जंगल सत्याग्रह में भाग लेकर कारावास भोगा था; और आपात्काल समाप्त करने के लिए जो विशाल सत्याग्रह हुआ था, उस सत्याग्रह में संघ ने मतलब संघ के स्वयंसेवकों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था. ये दोनों राजनीतिक आंदोलन थे. लेकिन उनका संबंध राष्ट्रजीवन के साथ था.


विशिष्ट कार्यपद्धति

संघ की एक विशिष्ट कार्यपद्धति है. जिस क्षेत्र का संगठन होना चाहिए, ऐसा उसे लगता है, उस क्षेत्र के लिए वह कार्यकर्ता देता है. कुछ क्षेत्रों के बारे में अगुवाई अन्य की रही है और संघ ने उन्हें कुछ कार्यकर्ता दिये है. भारतीय जनसंघ डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने स्थापन किया. उसके लिए संघ ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटलबिहारी बाजपेयी, नानाजी देशमुख, सुंदरसिंग भंडारी, कुशाभाऊ ठाकरे, डॉ. महावीर त्यागी आदि श्रेष्ठ कार्यकर्ता दिये. इनमें से डॉ. महावीर त्यागी के अलावा अन्य सब संघ के पूर्णकालीन कार्यकर्ता थे. डॉ. मुखर्जी के अकाल निधन के कारण, पार्टी चलाने और उसके विस्तार की जिम्मेदारी इन लोगों पर आ पड़ी और उन्होंने वह अच्छी तरह से निभाई. 1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय होने के बाद, जनसंघ एक प्रकार से समाप्त हो गया. लेकिन जनता पार्टी के कार्यकर्ता संघ के
स्वयंसेवक नहीं रह सकेगे, ऐसी लहर उस पार्टी में निर्माण होने के कारण, संघ के साथ संबंध बना रहे, ऐसा माननेवाले स्वयंसेवक उसमें से बाहर निकले और सन् 1980 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की. जनता पार्टी से बाहर निकलकर भाजपा की स्थापना में आगे रहनेवाले संघ के स्वयंसेवक थे. संघ की कार्यपद्धति की यह विशेषता है की, संबंधित क्षेत्र के कार्यकर्ता ही वह क्षेत्र चलाए और वृद्धिंगत करे. इस दृष्टि से हर क्षेत्र स्वतंत्र और स्वायत्त है. मतलब उनका स्वतंत्र संविधान होता है. संस्था के लिए आवश्यक निधि जमा करने की उनकी अपनी पद्धति होती है. कोई भी क्षेत्र निधि के लिए संघ पर निर्भर नहीं होता. मुझे यह अहसास है कि अन्य क्षेत्रों की चर्चा यहाँ अप्रस्तुत होगी. तथापि, यह बताना ही चाहिए कि, वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना श्री बाळासाहब देशपांडे नाम के सरकारी अधिकारी ने की थी. उन्हें संघ ने आरंभ में दो कार्यकर्ता दिये थे. भारतीय मजदूर संघ की स्थापना दत्तोपंत ठेंगडी इस संघ के कार्यकर्ता ने की; तो विश्‍व हिंदू परिषद की स्थापना में तत्कालीन सरसंघचालक श्री मा. स. गोळवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी की अगुआई थी. लेकिन वे विश्‍व हिंदू परिषद के अध्यक्ष नहीं बने. पद के आकर्षण से कार्य आरंभ करनेवालों को श्रीगुरुजी का यह वर्तन अनोखा और अनाकलनीय लगेगा, तो इसमें कोई आश्‍चर्य नहीं.


स्वतंत्र और स्वायत्त

संघ क्या करता है? वह शुरु में कार्यकर्ता देता है. वे कार्यकर्ता, संबंधित क्षेत्र में स्वायत्तत्ता से काम करते है. कभी कभार संघ के साथ परामर्श होता ही है. संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में सब क्षेत्रों की प्रातिनिधिक उपस्थिति रहती है. लेकिन इसका अर्थ, संघ उनके पदाधिकारियों का चुनाव करता है, ऐसा करना अनुचित होगा. क्या सियासी पार्टी अपने पदाधिकारी कौन होगे यह निश्‍चित करती है?  इन पदाधिकारियों में संघ ने अधिकृत रूप से दिया हुआ कार्यकर्ता भी हो सकता है. लेकिन निर्णय संबंधित संगठन का होता है. किस मतदार संघ से लोकसभा का उम्मीदवार कौन हो, यह संघ नहीं बताता. किस प्रान्त का भाजपा का अध्यक्ष कौन होगा यह भी संघ नहीं तय करता. क्या 10 जनपथ ऐसा ही करता है, यह 'इंडियन एक्सप्रेस'के विद्वान संपादक बताए और फिर तुलना करें. किसी विशिष्ट संदर्भ में, संबंधित क्षेत्र के लोग संघ के अधिकारियों के साथ सलाह-मश्‍वरा करते है. लेकिन निर्णय उनका ही होता है. लेकिन संघ की इतनी अपेक्षा निश्‍चित ही होती है कि, संबंधित संगठन अपने संगठन से राष्ट्र को बड़ा माने. मतलब समाज और समाज की मूल्यव्यवस्था को श्रेष्ठ माने. सही कहे या गलत, लेकिन संघ यह बताता है कि, व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं, संगठन श्रेष्ठ है, और संगठन से भी राष्ट्र श्रेष्ठ है. संघ में ऐसी ही पद्धति है. इसलिए संघ में 'डॉ. हेडगेवार की जय' या 'श्रीगुरुजी की जय' जैसे घोष-वाक्य नहीं है. संघ का एक ही घोष-वाक्य है और वह है 'भारत माता की जय'. इसका तात्पर्य समझना कठिन नहीं लगना चाहिए, ऐसा मुझे लगता है.


अडवाणी प्रकरण

अब अभी का ताजा प्रकरण, श्री लालकृष्ण अडवाणी के त्यागपत्र का. उस त्यागपत्र का सही कारण वे ही बता सकेगे. उन्होंने अपने  त्यागपत्र में पार्टी से कुछ अपेक्षाएँ व्यक्त की है. वे अपेक्षाएँ ठीक ही है. उनका त्यागपत्र अचानक आने के कारण सब को धक्का लगा. सरसंघचालक को भी लगा होगा. मेरी ऐसी जानकारी है कि, भाजपा के ही किसी वरिष्ठ नेता ने इसकी जानकारी सरसंघचालक जी को दी और वे अडवाणी जी से बात करे, ऐसा सूचित किया. प्रथम दूरध्वनि किसने किया? अडवाणी जी या भागवत जी ने? ऐसे प्रश्‍न उपस्थित करने में कोई मतलब नहीं. भाजपा में संकट निर्माण हुआ है, वह दूर हो, ऐसा ही भाजपा के सब हितचिंतकों को लगता होगा. अन्यथा, भाजपा के संसदीय मंडल ने अडवाणी जी का त्यागपत्र तुरंत मंजूर कर प्रश्‍न वही सदा के लिए समाप्त किया होता. लेकिन उन्होंने त्यागपत्र मंजूर नहीं किया. कारण उन्हें निश्‍चित ही ऐसा लगा होगा कि, अडवाणी जी जैसे वयोवृद्ध, अनुभवसमृद्ध, ज्येष्ठ नेता ने पार्टी में रहना चाहिए और उसी दृष्टि से किसी ने सरसंघचालक जी से अडवाणी जी के साथ बात करने की बिनति की होगी. इसमें अनुचित क्या है? अपने कार्यकर्ता चला रहे कार्य सही तरीके से चलते रहे, उसमे मतभेद होने पर भी मनभेद  न हो, क्या ऐसा लगना स्वाभाविक नहीं?


संघ का निर्धार

'इंडियन एक्सप्रेस'के संपादक ने उपदेश किया है कि, संघ खुलकर राजनीति में आये. लेकिन संघ वह उपदेश मान्य नहीं करेगा. कारण उसे राजनीति की अपेक्षा राष्ट्रकारण महत्त्व का लगता है; और राजनीति ने भी राष्ट्रकारण का श्रेष्ठत्व मान्य करना चाहिए, ऐसी संघ की अपेक्षा है. चुनाव की राजनीति में उतरने से कोई भी संघ को रोक नहीं सकता. लेकिन राजनीति जैसे समाजजीवन के एक क्षेत्र के साथ एकरूप नहीं होना, यह संघ की भूमिका है और निर्धार भी है. हमारे शास्त्र में आत्मतत्त्व या प्राणतत्त्व का संपूर्ण ऐहिक जीवन के साथ जो और जैसा संबंध होता है, वैसा संघ का इन सब क्षेत्रों के साथ है. इस कारण, वह उन सब क्षेत्रों से संबंद्ध भी है और संबंद्ध नहीं भी. ईशोपनिषद् आत्मतत्त्व के इस ऊपरी परस्परविरुद्ध वर्तन का इस प्रकार वर्णन करता है

तदेजति तनैजति। तद् दूरे तद्वन्तिके।

तदन्तरस्य सर्वस्य। तदु सर्वस्यास्य बाह्यत:।

इस मंत्र का सरल अर्थ है - ''वह हलचल करता है, और वह हलचल नहीं करता. वह दूर है और वह पास है. वह सबके भीतर है और वह सबके बाहर है.''

संघ, अपने नाम के 'राष्ट्रीय' इस आद्यपद के साथ सुसंगत, राष्ट्रजीवन के आत्मतत्त्व के अनुसार कहे अथवा प्राणतत्त्व के समान है.


- मा. गो. वैद्य
नागपुर, दि. 14-06-2013

babujivaidya@gmail.com

Friday, June 14, 2013

Fwd: Petrol





 

 

Petrol Price Hike Again….

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

LAST SOLUTION….

 

 

 

 

 

 

 Mukesh Patel

 

P Please don't print this e-mail unless you really need to.


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Thursday, June 13, 2013

कश्मीर में नफरत की फसल काटने वालों का सच


कश्मीर में नफरत की फसल काटने वालों का सच

By Hari Om on June 13, 2013

http://www.niticentral.com/2013/06/13/kashmiri-leadership-trying-to-alienate-muslims-from-rest-of-india-hindi-89467.html?utm_source=twitterfeed&utm_medium=twitter

 

कश्मीर में नफरत की फसल काटने वालों का सचकश्मीरी लीडरशिप और उनके दिल्ली और दूसरे भागों में रहने वाले समर्थक इस तरह का माहौल बनाने की कोशिश करते रहे हैं जैसे कि जम्मू-कश्मीर के मुसलमान भारत से दूर हो गए हैं। यानी के वे अपने को भारत से भावनात्मक रूप से जोड़ कर नहीं देखते। उनकी भारत को लेकर इस तरह की भावना को उसी सूरत में दूर किया जा सकता है बशर्ते कि उन्हेंअपने राजनीतिक भविष्य का फैसला लेने का अधिकार दिया जाए।

सच्चाई यह है कि इस तरह की धारणा पूरी तरह से अधकचरी और सच्चाई से बहुत दूर है। दरअसल, इस तरह का माहौल बनाकर देश को गुमराह करने की खतरनाक कोशिश की जा रही है, ताकि सूबे में जो चाहे किया जा सके।

बेशक, ये कहना मुल्क और मानवता के साथ नाइंसाफी होगी कि जम्मू-कश्मीर के सभी मुसलमान पृथकतावादी और साम्प्रदायिक हैं। वस्तुस्थिति यह है कि राज्य के मुसलमानों का एक छोटा सा ही हिस्सा भारत से नफरत करता है। बेशक, ये भारत से अलग होने के ख्वाब भी देखता है।

कश्मीर घाटी में इस छोटे से वर्ग को कई स्तरों पर विशेषाधिकार मिले हुए हैं। इन्हें दामादों की तरह से मान-सम्मान मिलता है। इनका संबंध मुसलमानों के सुन्नी समुदाय से है। ये छोटी-छोटी घटनाओं को भी इस तरह से पेश करते हैं ताकि वहां पर अवाम सड़कों पर आ जाए। ये सब करने के पीछे इनका मूल मकसद अपने हितों की पूर्ति करना ही रहता है।

अफसोस इस बात पर भी होता है कि कश्मीर में नफऱत की फसल उगाने और काटने वालों को मीडिया का एक वर्ग का खुलकर समर्थन हासिल है।

सरकार इन सब बातों से वाकिफ है । पर फिऱ भी उसकी तरफ से इस तरह की कोई ठोस पहल नहीं होती कि वह इन देश-विरोधी ताकतों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करे। वह भी इन तत्वों की गतिविधियों को जानने -समझने के बाद भी मूक दर्शक बनी रहती है। उसके इस तरह के रवैये के चलते जम्मू-कश्मीर की राष्ट्रवादी ताकतों को बहुत नुकसान होता है।

इस तथ्य को समझने की जरूरत है कि राज्य की तीन हिस्से हैं। जम्मू,कश्मीर और लद्धाख एक दूसरे भिन्न हैं। जम्मू में हिन्दू बहुमत में हैं। यहां पर ६९ फीसद हिन्दू तथा २७ फीसद मुसलमान हैं। इसमें दस जिले हैं। कठुआ,सांबा,जम्मू,रियसी,ऊधमपुर और रामबन में हिन्दू बहुमत में हैं। डोडा,किश्तवाड़,पूंछ और राजौरी में मुसलमान बहुमत में हैं।

जम्मू रीजन की सबसे खास बात यह है कि यहां पर सभी मजहबों के लोग एक दूसरे के साथ बड़ी ही मोहब्बत,खलूस और अमन के साथ रहते हैं।

कश्मीर घाटी में पृथकतावदी आंदोलन के चलने के बाद भी कभी साम्प्रयादिक दंगा नहीं हुआ। एक बार भी भारत विरोधी प्रदर्शन नहीं हुआ। जम्मू के हिन्दुओं की तरह से वहां के मुसलमान भी कश्मीरी पृथकतावादी तत्वों के इरादों का विरोध करते हैं।

अगर जम्मू क्षेत्र के कुछ हजार मुसलमानों को छोड़ दिया जाए तो ये गैर-कश्मीरी हैं। इनकी हमेशा शिकायत रहती है कि कश्मीरी नेतृत्व का उनको लेकर रुख भेदभावपूर्ण रहता है। वजह यह है कि ये इनके भारत विरोधी आंदोलन का हिस्सा नहीं बनते।

जम्मू क्षेत्र के मुसलमान,जो बड़े पैमाने पर गुर्जर हैं, १९९१ से केन्द्र सरकार से मांग कर रहे हैं कि उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिले। ये सुन्नी हैं। ये जम्मू-कश्मीर के संविधान में संशोधन की मांग कर रहे है ताकि इन्हें भी वे सारी सुविधाएं हासिल हो सके जो अनुसूचित जनजातियों को मिल रही हैं। एक बात और । जम्मू क्षेत्र के मुसलमानों ने सेना या अर्धसैनिक बलों पर मानवाधिकारों के हनन करने का आरोप कभी नहीं लगाया। ये तो सुरक्षा बलों पर बहुत भरोसा करते हैं।

उधर, लद्धाख क्षेत्र में बौद्ध बहुमत में हैं तो करगिल जिले में शिया। शिया मुसलमानों की भारत को लेकर निष्ठा गजब की है। ये भारतीय सेना का भी साथ देते हैं। ये पाकिस्तान से नफरत करते हैं। ये भी गुर्जर और बक्करवाल मुसलमानों की तरह कश्मीर में चल रही भारत विरोधी गतिविधियों को कुचलने में सेना का साथ देते हैं। दरअसल,जम्मू और लद्धाख जो राज्य के कुल जमा क्षेत्रफल का ८८ फीसद है, पूरी तरह से भारत के पक्ष में है।

अब कश्मीर की भी सुन लीजिए। जम्मू की तरह से इसके भी दस जिले में हैं। इनमें लगभग सौ फीसद मुसलमान हैं।

इधर भी कुछ असंतुष्ट तत्वों को अगर छोड़ दिया जाए तो अधिकतर का कश्मीर घाटी में चल रहे साम्प्रदायिक आंदोलन से कोई लेना देना नहीं है।

कश्मीर के शिया अपने सूबे में पृथकतावादी आंदोलन का कसकर विरोध करते हैं। हां, इनमें वे शामिल नहीं हैं,जो हुर्रियत नेता अब्बास अंसारी और दूसरे शिया नेताओं जैसे मौलवी इफ्तिखार अंसारी के असर में हैं। इनकी भी तादाद कुछ हजारों में ही होगी।

शिया,गुर्जर,बक्करवाल और पठवारी बोलने वाले मुसलमानों में और मूल कश्मीरी मुसलमानों में बहुत अंतर है संस्कृति के स्तर पर। इनके अलावा दर्द और बाल्टी मुसलमान भी हैं। ये भी पृथकतावादी आंदोलन के हक में नहीं है। अब जरा गौर कीजिए की कि जम्मू क्षेत्र के मुसलमानों को गुर्जर,बक्करवाल,पठवारी जुबान बोलने वाले, शिया, दर्द और बाल्टी मुसलमानों केसाथ जोड़ दिया जाए तो ये बहुमत में होंगे।

इनकी संख्या उनसे अधिक है,जो कश्मीरी बोलने वाले सुन्नी मुसलमान हैं। गौर करने लायक बात यह है कि ये भी एक नहीं हैं। ये भी सजातिय नहीं हैं। ये मोटे तौर पर पांच समूहों में बंटे हुए हैं। कोई पाकिस्तान के साथ विलय चाहता है, कोई आजादी,कोई भारत-पाकिस्तान का संयुक्त नियंत्रण,स्वायत्तता, सेल्फ रूल और कोई भारत से मिलने के हक में है। तो अब आपने जान ली होगी कश्मीर की हकीकत।

Wednesday, June 12, 2013

from M G Vaidya


 

अंतर्गत सुरक्षा की समस्या

किसी भी राज्यव्यवस्था का कर्तव्य, बाहरी आक्रमण से अपनी प्रजा की रक्षा करना होता है. प्रजा का सुख ही राजा का सुख और प्रजा का हित ही राजा का हित - ऐसा आर्य चाणक्य ने बहुत पहले बताया है. प्रजा के सुख और हित को दो स्थानों से खतरा होता है. खतरे का एक स्थान कोई दूसरे देश हो सकते है; तो दूसरा स्थान अपने ही राज्य के चोर, डकैत, हत्यारें या उनका समूह हो सकता है. पहला प्रकार बाह्य शत्रु का है, तो दूसरा प्रकार उसी देश में रहनेवाले लोगों की ओर से मतलब अंतर्गत शत्रुओं से संभव है. प्रस्तुत लेख में हम अतंर्गत लोगों की ओर से निर्माण होनेवाले खतरे का विचार करेंगे.

 

दो आतंकवाद

हम किसी भी तात्त्विक या काल्पनिक खतरे का विचार नहीं करेंगे. आज हमारे देश में जो परिस्थिति है, उसके संदर्भ में इस समस्या का विचार करेंगे. चोर, डकैत, हत्यारों का बंदोबस्त करना वैसे आसान होता है. कानून और सुरक्षा के पालन की जिम्मेदारी जिस व्यवस्थापर होती है, वह व्यवस्था मतलब राज्य का पुलीस विभाग, इसके लिए होता है. चोर, डकैतों की कोई एक टोली हो सकती है. उस टोली का बंदोबस्त करने का कर्तव्य, हमारा पुलीस विभाग पूरी ताकत से कर रहा है. ऊपर बताया ही है कि, यह काम आसान होता है. कारण इन टोलियों की शक्ति मर्यादित होती है. वे अन्य किसी के एजंट बनकर काम नहीं करते. अपना स्वार्थ ही उनके हिंसक कृत्य का प्रयोजन होता है. लेकिन, हमारे देश में, बाहर से मतलब हमारे देश के बाहर से, हमारे देश के शत्रु से जिन्हें प्रेरणा, मदद और प्रोत्साहन मिलता है, ऐसे दो हिंसक समूह है. दो प्रवाह है. दोनों प्रवाह, अपना हेतु साध्य करने के लिए हिंसा का आधार लेते है. हम उन्हें आतंकवादी या दहशतवादी कहते है. कारण उन्हें हिंसा द्वारा ही दहशत निर्माण कर, अपने प्रेरणास्त्रोतों का लाभ करा देना होता है. इनमें से एक प्रवाह का नाम जिहादी आतंकवाद है, तो दूसरे प्रवाह का नाम माओवादी आतंकवाद है.

 

जिहादी आतंकवाद

जिहादी आतंकवाद निर्माण करनेवाले मुसलमान होते हे. सब मुसलमान जिहादी आतंकवादी नहीं है. लेकिन जो जिहादी आतंकवादी है, वे सब मुसलमान मतलब इस्लाम को माननेवाले है.

 

इस्लाम में निष्ठावान मुसलमानों का 'जिहाद' पवित्र कर्तव्य माना गया है. 'जिहाद' का पूरा नाम 'जिहाद फि सबिलिल्लाह' है. अरबी भाषा में इस शब्दावली का अर्थ 'अल्लाह के मार्ग के लिए प्रयत्न' है, ऐसा जानकार लोग बताते है. अल्लाह के मार्ग के लिए प्रयत्न, अर्थात् ही पवित्र होगा. इस कारण जिहाद के साथ एक प्रकार की पवित्रता चिपकी है. 'अल्लाह'का मार्ग मतलब अल्लाह का राज्य फैलाने का मार्ग. इस ध्येय से प्रेरित होकर ही, पैगंबर साहब के अरबस्थान के अनुयायियों ने बहुत बड़ा पराक्रम किया था और केवल एक सदी में, संपूर्ण पश्‍चिम एशिया, उत्तर अफ्रीका और दक्षिण यूरोप को इस्लामी बना डाला था. इस पराक्रम की प्रेरणा 'जिहाद' ही थी. सेना के बल पर यह पराक्रम करने और उसके द्वारा सफलता करने के कारण, जिहाद और हिंसा के बीच अटूट नाता निर्माण हुआ है. ऐसा कहते है कि, पवित्र कुरान में दूसरा भी एक जिहाद बताया गया है. उसका नाम है 'अल्-जिहादुल्-अकब्बर'. अपने मन के कामक्रोधादि विकारों के साथ युद्ध, यह उसका अर्थ है. अर्थात् यह कोई समस्या होने का कारण नहीं. हिंसाचार के साथ और सही में क्रूरता के साथ जिनकी जड़ें जुड़ी है उनके ही संदर्भ में यह विवेचन है. पावित्र्य और क्रूरता का साथ किसे भी विचित्र ही लगेगा. लेकिन इस्लामी 'जिहाद'में वह होता ही है. 'जिहाद' शौर्य और क्रौर्य में भेद नहीं करता.

 

पाकिस्तान की हताशा

हम जानते है की, १५ ऑगस्त १९४७ को हमारा देश स्वतंत्र हुआ. लेकिन उसके साथ ही हमारे देश का विभाजन भी हुआ. मुसलमानों की बहुसंख्या के प्रदेश का पाकिस्तान नाम का नया राज्य बना. वह आज भी है. लेकिन १४ अगस्त को जितना प्रदेश मिला, उससे पाकिस्तान का समाधान नहीं है. उन्हें जम्मू-कश्मीर की रियासत भी पाकिस्तान में चाहिए थी. लेकिन जम्मू-कश्मीर के महाराज ने वह रियासत भारत में विलीन की. इंग्लँड के जिस कानून से, भारत और पाकिस्तान इन राज्यों की निर्मिति हुई, उसी कानून से, तत्कालीन रियासतों के राजाओं को, भारत में या पाकिस्तान में विलीन होने की या स्वतंत्र रहने की अनुमति भी मिली थी. यह बात पाकिस्तान को हजम नहीं हुई. फौज के बल पर जम्मू-कश्मीर का प्रदेश जीतकर पाकिस्तान में शामिल करने के लिए, उसने जम्मू-कश्मीर पर हमला किया. इस आक्रमण का मुकाबला महाराजा की सेना कर नहीं पाई, इसलिए महाराज ने भारत से मदद मांगी और इसके लिए अपना राज्य भारत में विलीन किया. फिर अधिकृत रूप से भारत की सेना जम्मू-कश्मीर में आई और उसने अपने पराक्रम से पाकिस्तान का आक्रमण विफल कर दिया. संपूर्ण जम्मू-कश्मीर ही पाकिस्तान से मुक्त हो जाता, लेकिन उस समय के हमारे मतलब भारत के शासकों को दुर्बुद्धि सुझी और वे यह मामला अकारण संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले गए; राष्ट्रसंघ ने एक प्रस्ताव पारित कर 'जैसे थे' स्थिति कायम रखी. इस कारण अभी भी जम्मू-कश्मीर का करीब इक तिहाई भाग पाकिस्तान के कब्जे में है.

 

हमलें

पाकिस्तान तो संपूर्ण जम्मू-कश्मीर हथियाना चाहता था. इसलिए उसने १९६५ में पुन: आक्रमण का मार्ग अपनाया. लेकिन इस बार भी उसका इरादा सफल नहीं हुआ. फिर 'जैसे थे' स्थिति ही कायम रही. फिर दूसरे ही मुद्दे पर १९७१ में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ. उसमें पाकिस्तान पूरी तरह से पराजित हुआ. तब पाकिस्तान के ध्यान में आया की, आमने-सामने के युद्ध में वह भारत को हरा नहीं सकता. इसलिए उसने, भारत के ही कुछ लोगों को बहकाकर, उन्हें फौजी प्रशिक्षण देकर, हथियार और पैसा देकर भारत में घातपात करने के लिए प्रेरित किया. पाकिस्तान द्वारा पोषित इन समूहों के नाम लष्कर-ए-तोयबा, मुजाहिद्दीन, हुजी, सीमी आदि अलग-अलग होने पर भी, उन सब का उद्दिष्ट एक ही है; और वह भारत को लहुलुहान स्थिति में रखना है. १९९३ को मुंबई में हुए विस्फोट से संसद पर हुए हमले तक या २००८ में ताजमहल होटल पर हुए बम हमले से हाल ही हैद्राबाद के (२१ फरवरी २०१३) और बंगलूर के बम विस्फोट तक (१७ अप्रेल २०१३) के सब जिहादी हमले पाकिस्तान की प्रेरणा से, पाकिस्तान ने दिए प्रशिक्षण और उसकी ही सहायता से हुए है.

 

घर के भेदी

इस जिहादी आतंकवाद को आश्रय देनेवाले हमारे देश में ही है. संजय दत्त का मामला इतना ताजा है की, उसका पुन: स्मरण करा देना आवश्यक नहीं. संजय दत्त स्वयं बम विस्फोट कराने में शामिल नहीं था, लेकिन इन जिहादी आतंकवादियों के हथियार रखने के लिए उसने अपने बंगले का उपयोग करने दिया. उसके बदले उसने एक एके - ५६ बंदूक अपने पास रख ली. संजय में थोड़ी भी देशभक्ति होती, तो उसने इस हिंस्त्र कार्य के लिए अपना घर दिया ही नहीं होता, और पुलीस को इसकी जानकारी दी होती. यह वस्तुस्थिति है कि, ऐसे देशद्रोही अपने ही देश में है. १९४६ में, हमारे देश में जो चुनाव हुए थे, उस चुनाव में मुस्लिम लीग का मुद्दा पाकिस्तान निर्मिति का था. मुसलमानों के लिए उस समय विभक्त सुरक्षित मतदारसंघ थे. इन मतदारसंघों में विभाजन की पक्षधर मुस्लिम लीग को ८५ प्रतिशत मुसलमानों ने मत दिये थे. वे मत, आज जो भारत है, उस प्रदेश के मुसलमानों के थे. वे पाकिस्तानवादी मुसलमान पाकिस्तान में नहीं गये. यही भारत रहे. उनके वंशज हमारे देश में है. उनमें से अनेकों का हृदयपरिवर्तन निश्‍चित ही हुआ होगा. लेकिन कुछ की वही मानसिकता होगी इसमें संदेह नहीं.

 

रामबाण उपाय

इस जिहादी आतंकवाद का बंदोबस्त करना वैसे तो कठिन नहीं. लेकिन हमारे शासक और अनेक सियासी पार्टियाँ ढोंगी सेक्युरलवाद से ऐसी ग्रस्त है की, वे मुसलमानों को राष्ट्रीय मुख्य प्रवाह में लाने के मार्ग में अडंगे निर्माण कर रही है. हमारे यहाँ जनतंत्र है. हर एक को एक मत है. हर मत का मूल्य समान है. फिर भी मुसलमानों को खुश करने के लिए अलग कानून और प्रावधान है. सब के लिए समान फौजदारी कानून है. लेकिन समान नागरी कानून नहीं. अब तो मुसलमान अपराधियों के लिए स्वतंत्र न्यायालय स्थापन करने की बात की जा रही है. १९४६ में जिन १५ प्रतिशत मुसलमानों ने विभाजन के विरुद्ध मतदान किया था, उन्हें ताकत देकर उनकी संख्या बढ़ाने के बदले सरकार की सब नीतियाँ विभाजन के पक्ष के ८५ प्रतिशत मुसलमानों की, उनके मतों के लिए, खुशामद करने की है. फिर मुसलमानों की मानसिकता कैसे बदलेगी? मुसलमानों में भी देशभक्त है. लेकिन उनके पास मुस्लिम समाज का नेतृत्व नहीं है. वह आना चाहिए. सरकार ने भी, 'हम सब का एक देश है, हम एक जन है, हमारी उपासनापद्धति भिन्न होते हुए भी हमारा एक राष्ट्र है', ऐसा भाव सब लोगों के मन में निर्माण करने के लिए कदम उठाने चाहिए. वैसी नीतियाँ बनानी चाहिए. इसमें भारत सरकार सफलता हासिल कर सकती है. केवल इच्छाशक्ति चाहिए, और मुख्य यह की हमारे संकुचित सियासी स्वार्थ से ऊपर उठना निश्‍चित करना चाहिए. पाकिस्तान द्वारा लादा गया यह जिहादी आतंकवाद का छद्मयुद्ध समाप्त करने का यही एकमात्र उपाय है. फौज और पुलीस उनका कर्तव्य निभाएगे ही. कमी सरकारी नीतियों की है. यहाँ के शिक्षित मुसलमान पाकिस्तान, अफगाणिस्थान, इरान, इराक, सीरिया आदि इस्लामी देशों की गतिविधियाँ देखते ही होगे. इन सब देशों में मुसलमान ही मुसलमानों के विरुद्ध लड़ रहे है. वस्तुत: हर किसी को शांत और सभ्य जीवन की ही आकांक्षा होगी. भारत के मुसलमान भी शांत और सभ्य जीवन ही चाहते होगे. उनकी इस मानसिकता की ओर सियासी पार्टियों का ध्यान होना चाहिए. ये लोग पाकिस्तान के एजंट बनकर काम नहीं करेगे, विपरित गद्दारों को सबक सिखाएंगे. हमारे देश की राजनीति की मुस्लिम खुशामद की दिशा बदलना यही इस जिहादी आतंकवाद पर रामबाण उपाय है. 'एक देश, एक जन, एक राष्ट्र' ही हमारे सब सामाजिक और सियासी क्रियाकलापों का नारा होना चाहिए.

 

वामपंथी आतंकवाद

जिहादी आतंकवाद को जैसे एक धार्मिक पृष्ठभूमि है, वैसी ही माओवादी आतंकवाद को एक बौद्धिक कहे या सैद्धांतिक पृष्ठभूमि है. नक्षली, माओवादी, ऐसे उनके अलग-अलग नाम है, लेकिन उनका प्रेरणास्त्रोत एक ही है. वह है साम्यवाद या कम्युनिझम्. साम्यवाद को जनतंत्र मान्य नहीं. उनका एकमात्र हथियार और विज्ञान, क्रांति है. और क्रांति कहने पर हिंसाचार आता ही है. १९१७ में रूस में हिंसाचार के माध्यम से ही क्रांति हुई. चीन में भी हिंसात्मक क्रांति हुई. चीन क्रांति के नेता माओ त्से तुंग थे. उनका आदर्श माननेवाले स्वयं को माओवादी कहने में गर्व महसूस करते है. क्रांति की यह लहर बंगाल के नक्षलबारी गाँव से निकली, इस कारण इन आतंकवादियों को 'नक्षली' विशेषण लगाया जाता है. उनका और भी एक नाम प्रचलित है. वह है 'पीपल्स वॉर ग्रुप' मतलब जनता के युद्ध के लिए तैयार समूह. उनका नाम ही बताता है कि वे युद्धरत है. इन में से कुछ समूहों को ईसाई चर्च की सहायता प्राप्त है. आंध्र प्रदेश में चंद्राबाबू नायडू के तेलगू देशम् पार्टी से सत्ता छीनने के लिए काँग्रेस ने इस 'पीपल्स वॉर ग्रुप'के साथ हाथ मिलाया था. उनकी सहायता से काँग्रेस ने तेलगू देशम् को पराजित किया. काँग्रेस के ये नेता थे वाय. एस. राजशेखर रेड्डी. वे ईसाई थे. इस उपकार के बदले सत्ता प्राप्त होते ही, राजशेखर रेड्डी के नेतृत्व की काँग्रेस सरकार ने इन आतंकवादियों के संगठन पर लगा प्रतिबंध हटा दिया था. आगे चलकर इस मुक्त भस्मासुर का हाथ अपने भी सिर पर पड़ेगा इसका अहसास होते ही, फिर उनपर प्रतिबंध लगाया गया.

 

उनकी आश्रय-भूमि

ये वामपंथी विचारधारा के क्रांतिप्रवण समूह, शहरों में सक्रिय नहीं होते. वे जंगल, पहाडों में सक्रिय होते है. कारण वहाँ उन्हें छिपना और गुप्त कारवाईयों की रूपरेखा बनाना आसान होता है. हमें स्वतंत्र होकर ६५ वर्ष होने के बाद भी, इन क्षेत्रों के लोगों के विकास की ओर शासकों ने आवश्यक ध्यान नहीं दिया. उनके अज्ञान का लाभ उठाकर स्वार्थी साहुकारों ने भी उन्हें खूब लूटा. इन वामपंथी आतंकवादियों ने उनके बीच अपने लिए आस्था निर्माण की, और उनका समर्थन हासिल किया. उनमें से ही उन्हें कार्यकर्ता भी मिले. हिंसाचार पर उनका विश्‍वास होने के कारण उन्हें हथियारों की आवश्यकता थी. वह भारत के पड़ोसी देशों ने पूरी की. इन आतंकवादियों के पास आधुनिक प्रगत हथियार भी है. वह उन्हें विदेशों से मिले है, इसमें संदेह नहीं. छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड इन एक-दूसरे से सटे राज्यों में उनकी शक्ति केंद्रित है. और इन राज्यों की सीमाओं से जुड़ा हुआ महाराष्ट्र का गढ़चिरोली जिला, तथा आंध्र प्रदेश के सीमावर्ती जिले भी आतंकवादग्रस्त है. इन प्रदेशों पर अपना स्वामित्व प्रस्थापित कर, अन्यत्र फैलाव के लिए एक 'लाल मार्ग' (Red Corridor) निर्माण करने का उनका इरादा है. इसका अर्थ यह है की, संपूर्ण भारत उनका आघातलक्ष्य है. एक दृष्टि से उनके बंदोबस्त के लिए यह सुविधाजनक भी है. उनकी केंद्र सरकार द्वारा घेराबंदी भी हो सकती है.

 

राज्यों के अहंकार

इन हिंसक समूहों की कारवाईयाँ, अलग-अलग राज्यों में होने के कारण, और कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी संबंधित राज्यों की होने के कारण, उनकों जड़ से समाप्त करने की रणनीति सफल नहीं हो सकती. वस्तुत:, आतंकवाद की यह समस्या संबंधित राज्यों की ही नहीं. वह संपूर्ण भारतवर्ष की समस्या है. इसलिए इस समस्या के निराकरण के लिए केंद्र के ही अभिक्रम की आवश्यकता है. सौभाग्य से, विलंब से ही सही, केंद्र को इसका अहसास हुआ है. केंद्र सरकार ने एक 'नॅशनल इन्व्हेस्टिगेशन एजन्सी' (एनआयए)की निर्मिति की है. इसी प्रकार प्रत्यक्ष कारवाई के लिए 'नॅशनल काऊंटर टेररिझम् सेंटर' भी (एनसीटीसी) स्थापन करना निश्‍चित किया है. लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि, इस आतंकवादविरोधी केंद्र की स्थापना को आतंकवादग्रस्त राज्यों का ही विरोध है. उन्हें लगता है कि, हमारे अधिकारों पर यह अतिक्रमण है. यह बात इन राज्य सरकारों के ध्यान में नहीं आती की, यह संपूर्ण देश की समस्या है. इस आतंकवाद का सामना राज्य सरकारें सफलतापूर्वक नहीं कर सकती. वे ऐसा कर सकती, तो अब तक यह समस्या कायम ही नहीं रहती. केंद्र सरकार जो आतंकवादविरोधी केंद्र स्थापन करनेवाली है, उसे अपराध खोजना, अपराधियों की जाँच करना, उन्हें गिरफ्तार करना, उनके विरुद्ध मुकद्दमें चलाने के अधिकार होगे. यह अधिकार राज्यों के पास भी है. लेकिन आतंकवादी एक राज्य में कारवाई कर पड़ोस के राज्य में भाग सकते है, और भाग भी जाते है. वहाँ उनके समर्थक समूह होते ही है. इस स्थिति में जिस राज्य में आतंकवादी घटना घटित होती है, वह राज्य कुछ भी नहीं कर पाता. इसलिए उनके बंदोबस्त के अधिकार केंद्र के पास ही होने चाहिए.

 

बल-प्रयोग अपरिहार्य

हमारा संविधान 'फेडरल स्टेट'को मान्यता देता है और केंद्र की कारवाई इस फेडरॅलिझमपर आक्रमण है आदि अनेक राज्यों द्वारा किए जानेवाले युक्तिवाद फालतू है. संविधान में कहीं भी 'फेडरल' शब्द नहीं है. तथापि यह सब तात्त्विक चर्चा यहाँ अप्रस्तुत है. सबका उद्दिष्ट इस आतंकवाद को मिटाना ही होना चाहिए; और इसके लिए सबने केंद्र को मन से मदद करनी चाहिए. आवश्यक हो तो केंद्र ने छ: माह के लिए इन नक्षलग्रस्त अथवा माओग्रस्त प्रदेशों में आपात्काल की घोषणा करनी चाहिए. हमारे संविधान की धारा ३५२ इसके लिए केंद्र सरकार को अधिकार देती है. इस धारा के अंतर्गत देश के विशिष्ट प्रदेशों में भी आपात्काल लागू किया जा सकता है. इस आपात्काल में अर्धसैनिक बल या सेना का उपयोग करने में हरकत नहीं. इस समय में मानवाधिकार भी निलंबित किए जा सकते है. मानवाधिकार मानवों के लिए होते है; हिंस्त्र दानवों के लिए नहीं. यह कारवाई करते समय ही, नक्षलवादियों के भय से, उनके एजंट या समर्थक बने वनवासियों के विकास की योजनाएँ भी सरकार ने शुरू करनी चाहिए. इस दृष्टि से गढ़चिरोली जिले के पुलीस अधिकारी सुवेज हक के प्रयोग का मूल्यांकन कर, क्या व्यापक स्तर पर उसका अनुसरण उपयुक्त सिद्ध हो सकता है, इसकी जाँच करनी चाहिए.

 

तात्पर्य यह की, तथाकथित धार्मिक भावना पर हो अथवा अन्य सैद्धांतिक आधार पर हो, हिंसाचार से अपना उद्दिष्ट हासिल करने की इच्छा रखनेवालों का जड़ से सफाया किया जाना चाहिए. हमारे यहाँ जनतांत्रिक व्यवस्था है, जनसमर्थन प्राप्त कर सबको अपना उद्दिष्ट प्राप्त करने की स्वतंत्रता है. इस संवैधानिक मार्ग से ही सामाजिक हो या सियासी परिवर्तन किया जाना चाहिए. ऐसा वातावरण हमारे देश में निर्माण होना चाहिए.

 

मा. गो. वैद्य
नागपुर
babujivaidya@gmail.com

Friday, June 7, 2013

Indonesia's beautiful gesture


If Indian embassy did any thing of the sort,India will lose half of seculars to heart attack.Remember when blind school children were singing praises to Swaraswathi , with human resource minister Murali Manohar Joshi presiding in Delhi, all non BJP parties staged a walk out.  One of them who walked out was named Bharathi who was education minister of Andhra Pradesh.
 
Shameful indeed such a tribe who cannot honor their own ancestral cultural heritage.
US is genuinely secular in contrast to pseudo secular New Delhi. Yet no Congressman( representative in US Congress, not of SoniaG's) has ever walked out when prayers were recited in the House by Hindu priest. In contrast Vandematarm that played significant role in freedom struggle was barred from singing in Indian Parliament for nearly 50 years until BJP got into parliament with strength of 100 members.
 
As such,, in contrast, the Indonesian gesture of having Saraswathi statue at their embassy in Washington DC is most welcome news.
 
India's culture and civilization spread far and wide influencing Indian Ocean community as well as China and beyond. For that to happen the nationals of those areas flocked to universities like Taxsila and Nalanda. Saraswathi temple was located in N.Kashmir near the Taxsila. By itself the temple was store house of such great knowledge even Adi Sankara and Sri Ramanuja made a pilgrimage to get references and endorsements for their Advaitha and Visishtaadviata philosophies.

So it is good to note even if 'secular socialist' India forgot such heritage,Indonesia remembers. We should be grateful to Indonesia for this beautiful gesture.
 
PS: Pakistan also shares same heritage as Indonesia and both are largely Moslem nations. But there is difference. While Indonesia honors Goddess Saraswathi, Pakistan uses relic of Saraswathi temple in N Kashmir for shooting practice by their troops. Also it is altogether heart rending story as to how the sacred image of Saraswathi there worshiped in past by such greats as noted above,got thrown into river,through deception of Maharaja of Kashmir who wanted to save the sacred image on eve of partition.

Any way May Goddess Saraswathi bless people and authorities of Indonesia. And God bless US 

Monday, June 3, 2013

Aryaadan Muhammed's speech

Aryaadan Muhammed's speech

 

Sri. Aryadan Muhammad ( Minister of Power and Transport, INC MLA from Nilambur ) speaking at the Hindu  Sammelan held on 21st May 2013, at the Putharikandam Maithan, Trivandrum, Kerala. He was inaugurating the session on 'National Security'.

 

When I was invited to this Ananthapuri Hindu Maha Sammelan, I accepted the invitation without hesitation. The reason for this is twofold. The main reason for accepting the invitation is the respect I have for the Hindu religion and the Hindus. I believe that Hindu religion is something which stands against divisiveness – divisiveness based on caste, community and religion. We all know that Hinduism was the first religion in India. In fact if someone asks when the Hindu religion came into being, the answer would be that Hindu religion came into being when India came into being.

Another reason for me to accept this invitation is that, I personally have a relationship with Hinduism. My father's father's father's father's father was a Hindu. Everybody knows this. At the onset, there were only Hindus in India. That was so for thousands of years after India came into being. It was because of the tolerance of Hindu religion that other religions established themselves here. It was just 1400 years back, in the 8th century, that Muslims came here. Before that there were only Hindus in India. It was in AD 52 that the Christians came to India. At that time St. Thomas came to India. And the belief is that he planted 7 and a halfCrosses here. And one half of that cross was searched for at Nilakkal. All these developments took place in recent times. So who is the father's father's father'sfather of the Christians ? It is a Hindu. You should have no doubt about that. So, I have a relationship with Hindu religion. Every Indian has a relationship with Hindu religion. I don't see this religion as being similar to other religions. As Swami Vivekananda said, it is a way of life. It is a culture. It is not a religion like Islam. Not like Christianity. If it was so, there would not be another religion in India. On the other hand till recently there was a flow of converts to Buddhism from Hinduism. This flow of converts was stopped by Sri Shankaracharya's ' Advaitasidhanta'. We can see Buddhists all over the world and in China. It was a religion which evolved from Hindu religion, from India. It was Sankaracharya's Advaitaprinciple which strengthened the Hindu religion and held it together as it is today.

I know there might be so criticism regarding me coming here, I have always swum against the tide. I have not been defeated yet.

I have come here also because it was my duty to do so. Hindu religion should not perish in this country. It should survive in this country. Hindu religion is the religion of this country. This can be accepted by everyone. Not only that, I have no doubt that Hindu religion is rooted in the concept of tolerance. One should not forget that it was the Hindu kings who welcomed St. Thomas in AD 52 and allowed them freedom to convert. Likewise when the Muslims came over here, it was the King- the Zamorine, who welcomed them and even gave them a separate title-name. This would never have happened if the religion here was anything other than Hinduism. That is why I say that, the people of India cannot and should never forget Hinduism. It would not be right to do so. This is all I have to say. I once again acknowledge the Hindu religion which is based on the principle of Advaita, the principle based on unity, as being responsible for the peace and tranquility in this country and express my wish that it remains so in the country for all time.

This is a program on national security and in this occasion I have to say that thesection which can ensure this security are the Hindus who have maximum allegiance towards this nation. The political formation which is most interested in the integrity of the country is the Congress and the people who aid them in this endeavor are the Hindus. The BJP also stands for national integrity like the congress. There is no doubt about it. Also, the survival of this nation is essential for world peace.