Tuesday, January 28, 2014

100 benifits of Pranayam & Meditation

100 Benefits of Meditation


Dear Colleagues,


Kindly read through the below mentioned 100 benefits of Pranayam / Meditation and may be make efforts to practice the same.


Physiological benefits:

1. It lowers oxygen consumption.

2. It decreases respiratory rate.

3. It increases blood flow and slows the heart rate.

4. Increases exercise tolerance.

5. Leads to a deeper level of physical relaxation.

6. Good for people with high blood pressure.

7. Reduces anxiety attacks by lowering the levels of blood lactate.

8. Decreases muscle tension

9. Helps in chronic diseases like allergies, arthritis etc.

10. Reduces Pre-menstrual Syndrome symptoms.

11. Helps in post-operative healing.

12. Enhances the immune system.

13. Reduces activity of viruses and emotional distress

14. Enhances energy, strength and vigor.

15. Helps with weight loss

16. Reduction of free radicals, less tissue damage

17. Higher skin resistance

18. Drop in cholesterol levels, lowers risk of cardiovascular disease.

19. Improved flow of air to the lungs resulting in easier breathing.

20. Decreases the aging process.

21. Higher levels of DHEAS (Dehydroepiandrosterone)

22. Prevented, slowed or controlled pain of chronic diseases

23. Makes you sweat less

24. Cure headaches & migraines

25. Greater Orderliness of Brain Functioning

26. Reduced Need for Medical Care

27. Less energy wasted

28. More inclined to sports, activities

29. Significant relief from asthma

30. Improved performance in athletic events

31. Normalizes to your ideal weight

32. Harmonizes our endocrine system

33. Relaxes our nervous system

34. Produce lasting beneficial changes in brain electrical activity

35. Helps cure infertility (the stresses of infertility can interfere with the release
of hormones that regulate ovulation).

Psychological benefits:

36. Builds self-confidence.

37. Increases serotonin level, influences mood and behaviour.

38. Resolve phobias & fears

39. Helps control own thoughts

40. Helps with focus & concentration

41. Increase creativity

42. Increased brain wave coherence.

43. Improved learning ability and memory.

44. Increased feelings of vitality and rejuvenation.

45. Increased emotional stability.

46. Improved relationships

47. Mind ages at slower rate

48. Easier to remove bad habits

49. Develops intuition

50. Increased Productivity

51. Improved relations at home & at work

52. Able to see the larger picture in a given situation

53. Helps ignore petty issues

54. Increased ability to solve complex problems

55. Purifies your character

56. Develop will power

57. Greater communication between the two brain hemispheres

58. Respond more quickly and more effectively to a stressful event.

59. Increases ones perceptual ability and motor performance

60. Higher intelligence growth rate

61. Increased job satisfaction

62. Increase in the capacity for intimate contact with loved ones

63. Decrease in potential mental illness

64. Better, more sociable behaviour

65. Less aggressiveness

66. Helps in quitting smoking, alcohol addiction

67. Reduces need and dependency on drugs, pills & pharmaceuticals

68. Need less sleep to recover from sleep deprivation

69. Require less time to fall asleep, helps cure insomnia

70. Increases sense of responsibility

71. Reduces road rage

72. Decrease in restless thinking

73. Decreased tendency to worry

74. Increases listening skills and empathy

75. Helps make more accurate judgments

76. Greater tolerance

77. Gives composure to act in considered & constructive ways

78. Grows a stable, more balanced personality

79. Develops emotional maturity

Spiritual benefits:

80. Helps keep things in perspective

81. Provides peace of mind, happiness

82. Helps you discover your purpose in life

83. Increased self-actualization.

84. Increased compassion

85. Growing wisdom

86. Deeper understanding of yourself and others

87. Brings body, mind, and spirit in harmony

88. Deeper Level of spiritual relaxation

89. Increased acceptance of one self

90. Helps learn forgiveness

91. Changes attitude toward life

92. Creates a deeper relationship with your God

93. Increases the synchronicity in your life

94. Greater inner-directedness

95. Helps living in the present moment

96. Creates a widening, deepening capacity for love

97. Discovery of the power and consciousness beyond the ego

98. Experience an inner sense of Assurance or Knowings

99. Experience a sense of Oneness

100. Leads to enlightenment




N.B:- Knowing doing gap has existed from the times immemorial.


 Let's consciously endeavour to reduce the gap by taking some pains to inculcate the habit of Pranayam & meditation to  improve our own lives.


Sunday, January 26, 2014

minorities attensition 11038922

दैनिक जागरण (25 जनवरी, 2014)

अल्पसंख्यकों पर मेहरबानी

जैन समुदाय को भी बाकायदा 'अल्पसंख्यक' दर्जा दे दिया गया है। कम से कम इसी बहाने हमारा ध्यान इस विचित्र तथ्य पर भी जाना चाहिए कि हमारे देश में 'बहुसंख्यक' का कहीं कानूनी, संवैधानिक उल्लेख नहीं है। इसीलिए यह अन्याय चल रहा है कि मानित, नामित अल्पसंख्यक को जो अधिकार और सुविधाएं मिलती हैं, वह बहुसंख्यक को नहीं मिलतीं। यह दुनिया में अभूतपूर्व स्थिति है कि किसी देश में अल्पसंख्यक को वह अधिकार हासिल हो, जो बहुसंख्यक को नहीं है। जिन पश्चिमी लोकतंत्रों से अल्पसंख्यक संरक्षण की धारणा हमने नकल कर ली, वहां उसका अर्थ है कि अल्पसंख्यक को किसी अधिकार से वंचित न रहना पड़े। यह अर्थ कतई नहीं है कि अल्पसंख्यक को ऐसे विशेषाधिकार दें, जो कथित बहुसंख्यक को न मिलें। मगर भारत में यही अंधेर हो गया है! उदाहरण के लिए, यहां कोई अल्पसंख्यक के रूप में अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है, पर बहुसंख्यक के रूप में नहीं, क्योंकि संविधान में बहुसंख्यक का उल्लेख ही नहीं है। यह खुला अन्याय है कि एक मुस्लिम या ईसाई, भारतीय नागरिक और अल्पसंख्यक, दोनों रूपों में न्यायालय जा सकता है; किंतु एक हिंदू केवल नागरिक के रूप में। इस घोर अन्याय को कब पहचाना जाएगा?1यह गड़बड़ी संविधान में ही हो गई कि अल्पसंख्यक की पूरी चर्चा में कहीं बहुसंख्यक का उल्लेख नहीं है। कानूनी दृष्टि से यह घोर अंधकार भरी जगह है। इसीलिए सारी लूटपाट होती है। कानून में कोई बात स्वत: स्पष्ट नहीं होती। वैसे भी, जब लिखित धाराओं पर अथरें के भारी मतभेद होते हैं, जो न्यायिक निर्णयों में दिखते हैं; तब किसी अलिखित बात पर अनुमान ही किया जा सकता है। यदि मजहब, नस्ल, जाति और भाषा ; अथवा केवल मजहब और भाषा के आधार पर भी अल्पसंख्यक की पहचान करें तो तुलना में बहुसंख्यक कौन है? यह कानून में लिखकर स्पष्ट करना जरूरी है। साथ ही, यह भी कि बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक भी जिला, प्रांत या देश, किस क्षेत्रधार पर चिह्नित हो? संविधान, किसी सरकारी दस्तावेज, सुप्रीम कोर्ट के किसी निर्णय में बहुसंख्यक नामक शब्द कहीं नहीं मिलता है। अत: इसका न कोई नाम है, न पहचान। ध्यान दें, अनुपस्थित बहुसंख्यक से अल्पसंख्यक की धारणा ही असंभव हो जाती है! क्योंकि 'अल्प' और 'बहु' तुलनात्मक अवधारणाएं हैं। एक के बिना दूसरा नहीं हो सकता। मगर भारतीय संवैधानिक, कानूनी-राजनीतिक तंत्र में यही चल रहा है। तब वही होगा, जो हो रहा है: खुली मनमानी और अन्याय। अन्याय की पहचान इससे भी स्पष्ट है कि अल्पसंख्यक का अर्थ प्राय: एक विशेष समुदाय मात्र कर लिया गया है। जबकि संविधान की धारा 29 में जाति वाले आधार पर ब्राह्मण भी अल्पसंख्यक हैं। बल्कि हरेक जाति, पूरे देश, हरेक राज्य और अधिकांश जिले में अल्पसंख्यक हैं। धारा 30 में 'भाषा' वाले आधार पर हर भाषा-भाषी एकाध राज्य छोड़कर पूरे देश में अल्पसंख्यक हैं। तीन-चौथाई राज्यों में हिंदी-भाषी भी अल्पसंख्यक हैं। इन अल्पसंख्यकों के लिए कब, क्या होता है? यदि नहीं होता, तो क्यों? 1इसका उत्तार है कि अल्पसंख्यक की धारणा अस्पष्ट, अपरिभाषित है, जबकि बहुसंख्यक को कहीं नोट ही नहीं किया गया। इसी से मनमाने निर्णय होते हैं। हमारे विधान और संविधान में बहुसंख्यक के बिना ही अल्पसंख्यक अधिकार चल रहा है। अल्पसंख्यकों में भी केवल मजहबी अल्पसंख्यक, उनमें भी केवल एक चुने हुए अल्पसंख्यक को नित नई सुविधाएं और विशेषाधिकार, जो वास्तव में सबसे ताकतवर है! यह बात वह स्वयं जानता है जिस कारण उसके प्रतिनिधियों की भाषा दबंगई की होती है, किसी दबे-कुचले, उपेक्षित अल्पसंख्यक की नहीं, जो पश्चिमी समाजों की अल्पसंख्यक संरक्षण वाली चिंता का मूल था। इसीलिए उस विजातीय धारणा की मतिहीन नकल से यहां अल्पसंख्यक प्रावधान उलटे अतंर्विरोध के चलते अन्याय और देश-विभाजक राजनीति का हथकंडा बन कर रह गया है। यह हथकंडा ही है, यह इससे दिखेगा कि अल्पसंख्यक के मनमाने अर्थ को गलत बताने अथवा उसकी एकाधिकारी सुविधाओं को खारिज करने वाले सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को उपेक्षित कर दिया जाता है जैसे, मजहबी आधार पर आरक्षण। सुप्रीम कोर्ट ने बाल पाटिल तथा अन्य बनाम भारत सरकार मामले में निर्णय दिया था, 'हिंदू शब्द से भारत में रहने वाले विभिन्न प्रकार के समुदायों का बोध होता है। यदि आप हिंदू कहलाने वाला कोई व्यक्ति ढूंढना चाहें तो वह नहीं मिलेगा। वह केवल किसी जाति के आधार पर ही पहचाना जा सकता है। जातियों पर आधारित होने के कारण हिंदू समाज स्वयं अनेक अल्पसंख्यक समूहों में विभक्त हैं। प्रत्येक जाति दूसरे से अलग होने का दावा करती है। जाति-विभक्त भारतीय समाज में लोगों का कोई हिस्सा या समूह बहुसंख्यक होने का दावा नहीं कर सकता। हिंदुओं में सभी अल्पसंख्यक हैं। 1इससे क्या अनिष्ट हो सकता है, यह भी सुप्रीम कोर्ट के उसी निर्णय में है। न्यायाधीशों ने देश-विभाजन का उल्लेख करते हुए लिखा है कि अंग्रेजों द्वारा धार्मिक आधार पर किसी को अल्पसंख्यक मानने और अलग निर्वाचक-मंडल बनाने आदि कदमों से ही अंतत: देश के टुकड़े हुए। इसीलिए न्यायाधीशों ने चेतावनी भी दी, 'यदि मात्र भिन्न धार्मिक विश्वास या कम संख्या या कम मजबूती, धन, शिक्षा, शक्ति या सामाजिक अधिकारों के आधार पर भारतीय समाज के किसी समूह के अल्पसंख्यक होने का दावा स्वीकार किया जाता है, तो भारत जैसे बहु-धार्मिक, बहु-भाषायी समाज में इसका कोई अंत नहीं रहेगा।' न्यायाधीशों ने 'धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक होने की भावना को प्रोत्साहित करने' के प्रति विशेष चिंता जताई, जो देश में विभाजनकारी प्रवृत्तिबढ़ा सकती है। हमारे नेतागण और मतवादी बुद्धिजीवी ठीक उलटा करते जा रहे हैं। यह तभी रुकेगा, जब संविधान में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों स्पष्ट परिभाषित हो। दोनों के अधिकार किसी विशेषाधिकार नहीं, बल्कि समानता के सिद्धांत पर स्पष्ट किए जाएं। यही हमारे संविधान निर्माताओं की भावना थी।

[लेखक एस. शंकर वरिष्ठ स्तंभकार हैं]

<Artical by Shankar Sharan.docx>

Thursday, January 23, 2014

RAS dedication: Dalai Lama


Tibetan spiritual leader Dalai Lama on Friday praised the RSS for its support to the Tibetan cause and said it has done good work towards promoting the values of discipline and dedication.

Dalai Lama was talking to mediapersons at the RSS Smruti Mandir premises after paying tributes to RSS founder late K B Hedgewar and his successor Guruji Golwalkar at their memorials there.

Recalling his association with VHP leader Ashok Singhal and late RSS leader K S Sudarshan, Dalai Lama said that the RSS is working in India with dedication similar to ours in Tibet. "RSS has always supported the cause of Tibet and hence I always had love for it," Dalai Lama said, adding, 'RSS thinks not just for India but for the entire world."

Sarsanghchalak Mohan Bhagwat was away on tour but the two leaders spoke on phone during which Bhagwat told Dalai Lama that the RSS will continue to support the cause of Tibet.

RSS western region chief Ravi Joshi and Nagpur city chief Dilip Gupta accompanied him during the visit. Joshi described Dalai Lama's visit as "inspiring for swayamsevaks."



Tuesday, January 21, 2014

Fwd: FW: साधु-संतों को झूठे मामलों में फंसाकर जेल में डालने की घिनौनी हरकत से बाज आए केंद्र : श्रीश्री रविशंकर


देश की संस्कृति नष्ट करने में जुटी है केंद्र सरकार : श्रीश्री रविशंकर



बंगलुरु। प्रसिद्ध धर्मगुरु श्रीश्री रविशंकर ने केंद्र सरकार पर भारतीय संस्कृति और देश की प्रतिष्ठा को नष्ट करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया है। धर्मगुरु ने सरकार को आगाह किया है कि वह अपने राजनीतिक लाभ के लिए साधु संतों को झूठे मामले में फंसाकर जेल में डालने की घिनौनी हरकत से तुरंत बाज आए। उन्होंने कहा कि इसी साजिश के तहत कांची कामकोटि के वरिष्ठ शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती तथा विजयेंद्र सरस्वती को गिरफ्तार करके करीब १० साल तथा साध्वी प्रज्ञा को छह साल तक झूठे मामले में जेल में रखा गया। आखिरकार अदालतों ने उन्हें निर्दोष घोषित करके बरी कर दिया है। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार साधु संतों के खिलाफ जानबूझकर ऐसी कार्यवाही कर रही है।

बंगलुरु से 35 किलोमीटर दूर अपने आश्रम में श्रीश्री रविशंकर ने इस बात पर गम्भीर चिंता जताई की कि केंद्र की संप्रग सरकार खासकर इसकी अगुआ कांग्रेस इस देश की संस्कृति पर चोट करके इसके वैभव को धूल में मिलाने की अंतरराष्ट्रीय साजिश को समझ नहीं पा रही है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ऐसी बाहरी ताकतों के हाथों में खेलकर अपने राजनीतिक लाभ के लिए निर्दोष साधु संतों को झूठे मामलों में फंसा कर जेल में बंद कर रही है। उन्होंने कहा कि कोई भी संत सामान्यत: आतंकवाद से कोई वास्ता नहीं रखते हैं और शंकराचार्य जैसे अति सम्मानित धर्म गुरुओं की तो आतंकवाद और हिंसा में शामिल होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह सरकार केवल इन्हीं साधु संतों के पीछे पड़ी है। उन्होंने स्वीकार किया कि हो सकता है कि कुछ मामलों में धर्मिक क्षेत्र से जुड़े लोग हिंसा या अपराध की घटनाओं में लिप्त होते हों लेकिन इस बात को समझा जाना चाहिए कि ऐसे लोग धर्म की श्रद्धा का दुरुपयोग करते हैं और वे वास्तव में धर्मिक व्यक्ति नहीं होते।

उन्होंने कहा कि यूं तो उनका किसी राजनीतिक दल से सम्बन्ध नहीं है लेकिन जो पार्टी भारतीय संस्कृति की बात करें, उसके साथ उनकी निकटता होना स्वाभाविक है। जब कांग्रेस भारतीय संस्कृति तथा साधु संतों के पीछे पड़ी है तो वह ऐेसी पार्टी का समर्थन कैसे कर सकते हैं। वह ऐसी पार्टी का समर्थन करेंगे जो भारतीय संस्कृति तथा हिंदू धर्म की बात करती हो। उन्होंने एक प्रश्न के उत्तर में स्वीकार किया कि भारतीय जनता पार्टी अन्य पार्टियों से बेहतर है। उन्होंने स्वीकार किया कि कांग्रेस की विफलताओं और देश की निराशाजनक स्थिति को देखते हुए भाजपा नेता एवं गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना देशहित में होगा। धार्मिक व्यक्तियों के राजनीति में प्रवेश के बारे में उन्होंने कहा कि उन्हें सीधे प्रवेश करने की बजाए नेताओं का मार्गदर्शन करना चाहिए जैसा कि प्राचीनकाल में इस देश में हुआ करता था। उन्होंने योग गुरु बाबा रामदेव को भी सलाह दी कि उन्हें राजनीति में सीधे प्रवेश करने के बजाय नेताओं और सरकारों को मार्गदर्शन करने की महती भूमिका निभानी चाहिए।

यह पूछे जाने पर कि अंतरराष्ट्रीय साजिश से उनका क्या आशय है, श्रीश्री रविशंकर ने कहा कि भारत से ईष्र्या करने वाली पश्चिमी ताकतें यह साजिश हमेशा करती रहती हैं। ऐसी ताकतों को लगता है कि भारत को कमजोर तभी किया जा सकता है जब इसकी संस्कृति कमजोर हो जाए। उन्होंने सरकार को आगाह किया कि वह ऐसी बाहरी साजिशों को समझें और अपने तुच्छ राजनीतिक लाभ के लिए देश को कमजोर नहीं करें। 147 देशों में आर्ट ऑफ लिविंग नामक संस्था के प्रणेता श्रीश्री रविशंकर ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि उसकी गलत नीतियों की वजह से आज किसान आत्महत्या कर रहे हैं। किसानों को पर्याप्त सब्सिडी दिए जाने की आवश्यकता है लेकिन सब्सिडी पशुओं का मांस निर्यात करने वाले व्यापारियों को दी जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार चीनी का निर्यात तो मात्र 12 रुपए की दर से कर रही है जबकि देश में चीनी 34 रुपए की कीमत से कम में उपलब्ध नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चीनी एवं चावल का रंग साफ करने के चक्कर में उसमें गम्भीर बीमारियां पैदा करने वाले रसायन मिलाए जा रहे हैं।

उन्होंने मौजूदा भ्रष्टाचार समेत देश की विभिन्न समस्याओं के लिए एक ही पार्टी के लगातार लम्बे समय तक सत्ता में रहने को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि परिवर्तन तो जरूरी है। उन्होंने कहा कि अमेरिका तथा अन्य देशों की तरह यहां भी सत्ता नियंत्रण हर बार बदलते रहना चाहिए ताकि कोई भी पार्टी अपने को अपरिहार्य मान कर मनमानी न करने पाए। देश की ऐसी व्यवस्था के मध्य स्वयं उन्होंने राजनिति में आने की सम्भावना से साफ इन्कार करते हुए युवाओं को आगे आने एवं इसके लिए उन्हें प्रोत्साहित करने का आह्वान किया। उन्होंने 'आप' नेता और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को सलाह दी कि वह फिलहाल लोकसभा चुनाव के बजाय नगर निकायों और विधानसभा चुनावों तक ही अपने को सीमित रखें और इससे अनुभव प्राप्त करने के बाद लोकसभा चुनाव की तरफ बढ़ें। 


Thursday, January 16, 2014

FW: Swami Vivekananda Sardha shati samaroh vrutta 2013-14- Interview of Prof. Anirudhha Desapande, Organizser, 15-01-2014

> Date: Wed, 15 Jan 2014 14:48:44 +0530
> Subject: Swami Vivekananda Sardha shati samaroh vrutta 2013-14- Interview of Prof. Anirudhha Desapande, Organizser, 15-01-2014
> From: vaidya.vidyadhar@gmail.com
> To: me_mehtasunil@rediffmail.com; deodhar.nitin1@gmail.com; maheshbhai1658@yahoo.co.in; yshukla12000@yahoo.com; dr.kamalshah@yahoo.com; dracharyarr@yahoo.co.in; maunik_msu@yahoo.co.in; nikhil_20051@yahoo.com; ajayparikh.gvp@gmail.com; prof.bjm@gmail.com; mehta.apurva1@gmail.com; kb_kamaliya@yahoo.co.in; hiranink@yahoo.co.in; spkmshani@gmail.com; ranapratap.salunkhe@gmail.com; kedar.astromet@gmail.com; ketancdesai70@gmail.com; aspatel63@yahoo.com; maganlalbpatel@gmail.com; pateldarshanj@yahoo.com; anuragopl@gmail.com; bhadesia@hotmail.com; mmohanngp@gmail.com; ram.vaidya25@gmail.com; shirishb20@gmail.com; shrishdeopujari@rediffmail.com; rshiledar@yahoo.com; amitji.bikaner@gmail.com; vd.ganatra@gmail.com; hcpatel_58@yahoo.co.in; vijaybelsare@india.com; skbhavsar@yahoo.com; rameshnai@live.com; yadavpradeep86@gmail.com; pp.gujarat@sangh.org; sborisa@gmail.com; jadhavha@gmail.com; balkrishna_29@yahoo.com; bikarande@gmail.com; ervksood@gmail.com; dakhorekk@yahoo.com; rajputkn@yahoo.com; sudaoak@hotmail.com; chintan_7676@yahoo.in; bhargav_h_bhatt@yahoo.com
> Vivekananda emerged as the most acceptable figure of India—Prof
> Aniruddha Deshpande
> 150th Birth Anniversary Celebrations reconnect to Vivekananda's prism
> Throughout the year Vivekananda 150th birth anniversary was celebrated
> as Sardh Shati Samaroh not only in India but all over the world. While
> celebration year is ending, Organiser editor Prafulla Ketkar spoke to
> the All India General Secretary of the Samaroh Samiti Prof Aniruddh
> Deshpande on objectives, success and follow up of the Sardh Shati
> celebrations. Here are the excerpts of the conversations:
> How do you look at the year-long worldwide celebration to celebrate
> 150th birth anniversary of Swami Vivekananda? What were the objectives
> of the celebration?
> Recontextualising the main thoughts of Swami Vivekananda to the
> present world was the core objective of this celebration. Though
> Vivekananda addressed the problems related to poverty or education etc
> about 125 years ago, most of them still persist. That is why
> Vivekananda is still relevant not only for India but for humanity at
> large. The slogan of 'Awaken India, Enlighten the World' reconnected
> that relevance to the current situation.
> What types of activities were conducted in India to spread the message
> of Swami Vivekananda?
> The celebrations were broadly divided into five parts: 1. Yuva Shakti
> (Youth) 2. Savardhini (Women) 3. Prabuddha Bharat (Intellectual India)
> 4. Asmita (Vanvasis) 5. Gramayan (Rural India)
> On youth power, more than 250 seminars were held throughout India on
> Vivekananda's thought in which more than 1.5 lac youth participated.
> On September 11, 2013, on the occasion of Vishwa Bandhutva Diwas (the
> day Vivekananda delivered his famous message in the Conference of
> World Religions, at Chicago) more than 30 lac youth participated in
> the 'Bharat Jago Daud'. Collective Suryanamaskars were held to convey
> the Swamiji's message of 'healthy body for spiritual mind' and schools
> and colleges of 41 prants (functional regions of RSS) participated in
> the activity.
> Similarly, more than 1500 awareness camps were organised for
> adolescent girls on Indian culture and sanskaras, Vivekananda and
> women empowerment, health and education. Many conventions were
> organised for young couples to help them in leading life with
> Vivekanda's message. Five national conferences were held in the five
> corners of India namely Ahmedabad, Jaipur, Raipur, Kolkata and Chennai
> on five different themes, to involve in the intellectual class in
> spreading the Vivekananda's thought. The unprecedented event like
> Vice-Chancellors conference (which got wide publicity through
> Organiser, December 12, 2013), represented by 125 universities of
> India, was organised with the theme of 'Education as Man Making and
> Nation Building Exercise'. It was a great success for shaping the
> future courses in higher education for the youth India. More than 3000
> health camps, with participation of more than 500 women, were
> organised while 3.5 lac trees were planted to nurture the message of
> 'live with nature'. More than 300 villages are adopted for
> self-sufficient development. Besides many literary and cultural
> festivals, competitions were organised and people from all sections of
> society participated with enthusiasm.
> In other words, the Sardh Shati celebrations achieved a great balance
> of quality and quantity.
> It seems the government celebration remained mostly on papers and only
> the social organisations were seen conducting various activities
> throughout the year. What do you feel?
> The original idea was, people should come together and celebrate
> Vivekananda's thought and bring them in action. So no government help
> was sought, financially or otherwise. But all government's ministers,
> even bureaucrats made their representations in various programmes and
> whole heartedly supported the activities. The HRD minister Shri Pallam
> Raju himself inaugurated the VC conference. So governments were
> supportive but the activities were undertaken by the society. Though
> Vivekananda Kendra was at the forefront in organising these
> celebrations other organisations such as Ramkrishna Math, Sharda Math
> etc also played a very constructive role.
> What has been the response from outside India?
> In more than 40 countries similar activities were undertaken and
> people and governments wholeheartedly participated in the
> celebrations.
> What has been the biggest achievement of this year-long celebration?
> How far the defined objectives were achieved?
> The Sardh Shati celebrations can be considered as a great success
> because it has achieved the objective recontextualising Vivekananda in
> three ways. Firstly, Vivekananda and his message was reconnected to
> the contemporary issues and the present generation. In this regard, 4
> to 5 crore people were contacted through door to door contact with a
> portrait and a message of Vivekananda, which is unprecedented.
> Secondly, huge amount of literature was made available on Vivekananda.
> Sardh Shati Samiti itself published 21 types of booklets, which were
> distributed in large numbers. Thirdly and most importantly, it has
> established Vivekananda as the most acceptable figure of India.
> Whatsoever, there was not a single word of opposition to Vivekananda
> from any quarters of the society. The message of 'Awaken India to
> enlighten the world' is acceptable to all is the biggest achievement
> of this celebration.
> Lot of awareness has been generated all over the world during this
> celebration. Has the Committee planned any follow up action so that
> the awareness generated so far could be used for any positive activity
> in future? How would we carry forward the legacy of thought and
> actions of Swamiji?
> These celebrations were never meant for just organising events, it was
> just a starting for resurgence. Follow up activities are planned for
> each section. For the holistic development of villages, the concept of
> Vivek Gram will go on. Vivekananda study circles are taking shape to
> inculcate Swamiji's teaching through self-learning method. Vivekananda
> Study Centres and Chairs are being constituted in various universities
> and colleges. In Tamil Nadu itself, 9 universities have come up with
> the Vivekananda study centres. UGC is supporting this with generous
> funding. In February, a follow up meeting is organised with 45-50
> universities to introduce various courses on 'Vivekananda's thinking'.
> Libraries and community centres are built up with social initiatives
> known as Vivek Vatika. Health counseling will be institutionalised for
> the adolescent girls. Many activities will be continued for the
> sustainable development. Vivekananda's basic Indian thinking is still
> so relevant and Sardh Shati celebrations are successful in conveying
> that relevance so with or without support, these follow up activities
> will carry on and message of 'Awaken India, enlighten the world' will
> be realised.

Sunday, January 5, 2014

Vivek sewa sangam by Sewa Bharti Gujarat

विवेक सेवा संगम कार्यक्रम का समापन

सेवाभारती - गुजरात द्वारा आयोजित विवेक सेवा संगम कार्यक्रम का समापन 
प्रेस रिपोर्ट तथा फोटोग्राफ संलंग्न है।


Thursday, January 2, 2014

A k kejriwal


कैसे और क्‍यों बनाया अमेरिका ने अरविंद केजरीवाल को, पढि़ए पूरी कहानी!

Category: राजनीति
Published on Saturday, 28 December 2013 02:22
संदीप देव, नई दिल्‍ली। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली एनजीओ गिरोह 'राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी)' ने घोर सांप्रदायिक 'सांप्रदायिक और लक्ष्य केंद्रित हिंसा निवारण अधिनियम' का ड्राफ्ट तैयार किया है। एनएसी की एक प्रमुख सदस्य अरुणा राय के साथ मिलकर अरविंद केजरीवाल ने सरकारी नौकरी में रहते हुए एनजीओ की कार्यप्रणाली समझी और फिर 'परिवर्तन' नामक एनजीओ से जुड़ गए। अरविंद लंबे अरसे तक राजस्व विभाग से छुटटी लेकर भी सरकारी तनख्वाह ले रहे थे और एनजीओ से भी वेतन उठा रहे थे, जो 'श्रीमान ईमानदार' को कानूनन भ्रष्‍टाचारी की श्रेणी में रखता है। वर्ष 2006 में 'परिवर्तन' में काम करने के दौरान ही उन्हें अमेरिकी 'फोर्ड फाउंडेशन' व 'रॉकफेलर ब्रदर्स फंड' ने 'उभरते नेतृत्व' के लिए 'रेमॉन मेग्सेसाय' पुरस्कार दिया, जबकि उस वक्त तक अरविंद ने ऐसा कोई काम नहीं किया था, जिसे उभरते हुए नेतृत्व का प्रतीक माना जा सके।  इसके बाद अरविंद अपने पुराने सहयोगी मनीष सिसोदिया के एनजीओ 'कबीर' से जुड़ गए, जिसका गठन इन दोनों ने मिलकर वर्ष 2005 में किया था।  
अरविंद को समझने से पहले 'रेमॉन मेग्सेसाय' को समझ लीजिए!
अमेरिकी नीतियों को पूरी दुनिया में लागू कराने के लिए अमेरिकी खुफिया ब्यूरो  'सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए)' अमेरिका की मशहूर कार निर्माता कंपनी 'फोर्ड' द्वारा संचालित 'फोर्ड फाउंडेशन' एवं कई अन्य फंडिंग एजेंसी के साथ मिलकर काम करती रही है। 1953 में फिलिपिंस की पूरी राजनीति व चुनाव को सीआईए ने अपने कब्जे में ले लिया था। भारतीय अरविंद केजरीवाल की ही तरह सीआईए ने उस वक्त फिलिपिंस में 'रेमॉन मेग्सेसाय' को खड़ा किया था और उन्हें फिलिपिंस का राष्ट्रपति बनवा दिया था। अरविंद केजरीवाल की ही तरह 'रेमॉन मेग्सेसाय' का भी पूर्व का कोई राजनैतिक इतिहास नहीं था। 'रेमॉन मेग्सेसाय' के जरिए फिलिपिंस की राजनीति को पूरी तरह से अपने कब्जे में करने के लिए अमेरिका ने उस जमाने में प्रचार के जरिए उनका राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय 'छवि निर्माण' से लेकर उन्हें 'नॉसियोनालिस्टा पार्टी' का  उम्मीदवार बनाने और चुनाव जिताने के लिए करीब 5 मिलियन डॉलर खर्च किया था। तत्कालीन सीआईए प्रमुख एलन डॉउल्स की निगरानी में इस पूरी योजना को उस समय के सीआईए अधिकारी 'एडवर्ड लैंडस्ले' ने अंजाम दिया था। इसकी पुष्टि 1972 में एडवर्ड लैंडस्ले द्वारा दिए गए एक साक्षात्कार में हुई।
ठीक अरविंद केजरीवाल की ही तरह रेमॉन मेग्सेसाय की ईमानदार छवि को गढ़ा गया और 'डर्टी ट्रिक्स' के जरिए विरोधी नेता और फिलिपिंस के तत्कालीन राष्ट्रपति 'क्वायरिनो' की छवि धूमिल की गई। यह प्रचारित किया गया कि क्वायरिनो भाषण देने से पहले अपना आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए ड्रग का उपयोग करते हैं। रेमॉन मेग्सेसाय की 'गढ़ी गई ईमानदार छवि' और क्वायरिनो की 'कुप्रचारित पतित छवि' ने रेमॉन मेग्सेसाय को दो तिहाई बहुमत से जीत दिला दी और अमेरिका अपने मकसद में कामयाब रहा था। भारत में इस समय अरविंद केजरीवाल बनाम अन्य राजनीतिज्ञों की बीच अंतर दर्शाने के लिए छवि गढ़ने का जो प्रचारित खेल चल रहा है वह अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए द्वारा अपनाए गए तरीके और प्रचार से बहुत कुछ मेल खाता है।
उन्हीं 'रेमॉन मेग्सेसाय' के नाम पर एशिया में अमेरिकी नीतियों के पक्ष में माहौल बनाने वालों, वॉलेंटियर तैयार करने वालों, अपने देश की नीतियों को अमेरिकी हित में प्रभावित करने वालों, भ्रष्‍टाचार के नाम पर देश की चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने वालों को 'फोर्ड फाउंडेशन' व 'रॉकफेलर ब्रदर्स फंड' मिलकर अप्रैल 1957 से 'रेमॉन मेग्सेसाय' अवार्ड प्रदान कर रही है। 'आम आदमी पार्टी' के संयोजक अरविंद केजरीवाल और उनके साथी व 'आम आदमी पार्टी' के विधायक मनीष सिसोदिया को भी वही 'रेमॉन मेग्सेसाय' पुरस्कार मिला है और सीआईए के लिए फंडिंग करने वाली उसी 'फोर्ड फाउंडेशन' के फंड से उनका एनजीओ 'कबीर' और 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' मूवमेंट खड़ा हुआ है। 

भारत में राजनैतिक अस्थिरता के लिए एनजीओ और मीडिया में विदेशी फंडिंग! 
'फोर्ड फाउंडेशन' के एक अधिकारी स्टीवन सॉलनिक के मुताबिक ''कबीर को फोर्ड फाउंडेशन की ओर से वर्ष 2005 में 1 लाख 72 हजार डॉलर एवं वर्ष 2008 में 1 लाख 97 हजार अमेरिकी डॉलर का फंड दिया गया।'' यही नहीं, 'कबीर' को 'डच दूतावास' से भी मोटी रकम फंड के रूप में मिली। अमेरिका के साथ मिलकर नीदरलैंड भी अपने दूतावासों के जरिए दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में अमेरिकी-यूरोपीय हस्तक्षेप बढ़ाने के लिए वहां की गैर सरकारी संस्थाओं यानी एनजीओ को जबरदस्त फंडिंग करती है।
अंग्रेजी अखबार 'पॉयनियर' में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक डच यानी नीदरलैंड दूतावास अपनी ही एक एनजीओ 'हिवोस' के जरिए नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार को अस्थिर करने में लगे विभिन्‍न भारतीय एनजीओ को अप्रैल 2008 से 2012 के बीच लगभग 13 लाख यूरो, मतलब करीब सवा नौ करोड़ रुपए की फंडिंग कर चुकी है।  इसमें एक अरविंद केजरीवाल का एनजीओ भी शामिल है। 'हिवोस' को फोर्ड फाउंडेशन भी फंडिंग करती है।
डच एनजीओ 'हिवोस'  दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में केवल उन्हीं एनजीओ को फंडिंग करती है,जो अपने देश व वहां के राज्यों में अमेरिका व यूरोप के हित में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की क्षमता को साबित करते हैं।  इसके लिए मीडिया हाउस को भी जबरदस्त फंडिंग की जाती है। एशियाई देशों की मीडिया को फंडिंग करने के लिए अमेरिका व यूरोपीय देशों ने 'पनोस' नामक संस्था का गठन कर रखा है। दक्षिण एशिया में इस समय 'पनोस' के करीब आधा दर्जन कार्यालय काम कर रहे हैं। 'पनोस' में भी फोर्ड फाउंडेशन का पैसा आता है। माना जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल के मीडिया उभार के पीछे इसी 'पनोस' के जरिए 'फोर्ड फाउंडेशन' की फंडिंग काम कर रही है। 'सीएनएन-आईबीएन' व 'आईबीएन-7' चैनल के प्रधान संपादक राजदीप सरदेसाई 'पॉपुलेशन काउंसिल' नामक संस्था के सदस्य हैं, जिसकी फंडिंग अमेरिका की वही 'रॉकफेलर ब्रदर्स' करती है जो 'रेमॉन मेग्सेसाय'  पुरस्कार के लिए 'फोर्ड फाउंडेशन' के साथ मिलकर फंडिंग करती है।
माना जा रहा है कि 'पनोस' और 'रॉकफेलर ब्रदर्स फंड' की फंडिंग का ही यह कमाल है कि राजदीप सरदेसाई का अंग्रेजी चैनल 'सीएनएन-आईबीएन' व हिंदी चैनल 'आईबीएन-7' न केवल अरविंद केजरीवाल को 'गढ़ने' में सबसे आगे रहे हैं, बल्कि 21 दिसंबर 2013 को 'इंडियन ऑफ द ईयर' का पुरस्कार भी उसे प्रदान किया है। 'इंडियन ऑफ द ईयर' के पुरस्कार की प्रयोजक कंपनी 'जीएमआर' भ्रष्‍टाचार में में घिरी है।
'जीएमआर' के स्वामित्व वाली 'डायल' कंपनी ने देश की राजधानी दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा विकसित करने के लिए यूपीए सरकार से महज 100 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन हासिल किया है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक 'सीएजी'  ने 17 अगस्त 2012 को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जीएमआर को सस्ते दर पर दी गई जमीन के कारण सरकारी खजाने को 1 लाख 63 हजार करोड़ रुपए का चूना लगा है। इतना ही नहीं, रिश्वत देकर अवैध तरीके से ठेका हासिल करने के कारण ही मालदीव सरकार ने अपने देश में निर्मित हो रहे माले हवाई अड्डा का ठेका जीएमआर से छीन लिया था। सिंगापुर की अदालत ने जीएमआर कंपनी को भ्रष्‍टाचार में शामिल होने का दोषी करार दिया था। तात्पर्य यह है कि अमेरिकी-यूरोपीय फंड, भारतीय मीडिया और यहां यूपीए सरकार के साथ घोटाले में साझीदार कारपोरेट कंपनियों ने मिलकर अरविंद केजरीवाल को 'गढ़ा' है, जिसका मकसद आगे पढ़ने पर आपको पता चलेगा।
'जनलोकपाल आंदोलन' से 'आम आदमी पार्टी' तक का शातिर सफर!
आरोप है कि विदेशी पुरस्कार और फंडिंग हासिल करने के बाद अमेरिकी हित में अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया ने इस देश को अस्थिर करने के लिए 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' का नारा देते हुए वर्ष 2011 में 'जनलोकपाल आंदोलन' की रूप रेखा खिंची।  इसके लिए सबसे पहले बाबा रामदेव का उपयोग किया गया, लेकिन रामदेव इन सभी की मंशाओं को थोड़ा-थोड़ा समझ गए थे। स्वामी रामदेव के मना करने पर उनके मंच का उपयोग करते हुए महाराष्ट्र के सीधे-साधे, लेकिन भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध कई मुहीम में सफलता हासिल करने वाले अन्ना हजारे को अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली से उत्तर भारत में 'लॉंच' कर दिया।  अन्ना हजारे को अरिवंद केजरीवाल की मंशा समझने में काफी वक्त लगा, लेकिन तब तक जनलोकपाल आंदोलन के बहाने अरविंद 'कांग्रेस पार्टी व विदेशी फंडेड मीडिया' के जरिए देश में प्रमुख चेहरा बन चुके थे। जनलोकपाल आंदोलन के दौरान जो मीडिया अन्ना-अन्ना की गाथा गा रही थी, 'आम आदमी पार्टी' के गठन के बाद वही मीडिया अन्ना को असफल साबित करने और अरविंद केजरीवाल के महिमा मंडन में जुट गई।
विदेशी फंडिंग तो अंदरूनी जानकारी है, लेकिन उस दौर से लेकर आज तक अरविंद केजरीवाल को प्रमोट करने वाली हर मीडिया संस्थान और पत्रकारों के चेहरे को गौर से देखिए। इनमें से अधिकांश वो हैं, जो कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के द्वारा अंजाम दिए गए 1 लाख 76 हजार करोड़ के 2जी स्पेक्ट्रम, 1 लाख 86 हजार करोड़ के कोल ब्लॉक आवंटन, 70 हजार करोड़ के कॉमनवेल्थ गेम्स और 'कैश फॉर वोट' घोटाले में समान रूप से भागीदार हैं।  
आगे बढ़ते हैं...! अन्ना जब अरविंद और मनीष सिसोदिया के पीछे की विदेशी फंडिंग और उनकी छुपी हुई मंशा से परिचित हुए तो वह अलग हो गए, लेकिन इसी अन्ना के कंधे पर पैर रखकर अरविंद अपनी 'आम आदमी पार्टी' खड़ा करने में सफल  रहे।  जनलोकपाल आंदोलन के पीछे 'फोर्ड फाउंडेशन' के फंड  को लेकर जब सवाल उठने लगा तो अरविंद-मनीष के आग्रह व न्यूयॉर्क स्थित अपने मुख्यालय के आदेश पर फोर्ड फाउंडेशन ने अपनी वेबसाइट से 'कबीर' व उसकी फंडिंग का पूरा ब्यौरा ही हटा दिया।  लेकिन उससे पहले अन्ना आंदोलन के दौरान 31 अगस्त 2011 में ही फोर्ड के प्रतिनिधि स्टीवेन सॉलनिक ने 'बिजनस स्टैंडर' अखबार में एक साक्षात्कार दिया था, जिसमें यह कबूल किया था कि फोर्ड फाउंडेशन ने 'कबीर' को दो बार में 3 लाख 69 हजार डॉलर की फंडिंग की है। स्टीवेन सॉलनिक के इस साक्षात्कार के कारण यह मामला पूरी तरह से दबने से बच गया और अरविंद का चेहरा कम संख्या में ही सही, लेकिन लोगों के सामने आ गया।
सूचना के मुताबिक अमेरिका की एक अन्य संस्था 'आवाज' की ओर से भी अरविंद केजरीवाल को जनलोकपाल आंदोलन के लिए फंड उपलब्ध कराया गया था और इसी 'आवाज' ने दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए भी अरविंद केजरीवाल की 'आम आदमी पार्टी' को फंड उपलब्ध कराया। सीरिया, इजिप्ट, लीबिया आदि देश में सरकार को अस्थिर करने के लिए अमेरिका की इसी 'आवाज' संस्था ने वहां के एनजीओ, ट्रस्ट व बुद्धिजीवियों को जमकर फंडिंग की थी। इससे इस विवाद को बल मिलता है कि अमेरिका के हित में हर देश की पॉलिसी को प्रभावित करने के लिए अमेरिकी संस्था जिस 'फंडिंग का खेल' खेल खेलती आई हैं, भारत में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 'आम आदमी पार्टी' उसी की देन हैं।
सुप्रीम कोर्ट के वकील एम.एल.शर्मा ने अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया के एनजीओ व उनकी 'आम आदमी पार्टी' में चुनावी चंदे के रूप में आए विदेशी फंडिंग की पूरी जांच के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर रखी है। अदालत ने इसकी जांच का निर्देश दे रखा है, लेकिन केंद्रीय गृहमंत्रालय इसकी जांच कराने के प्रति उदासीनता बरत रही है, जो केंद्र सरकार को संदेह के दायरे में खड़ा करता है। वकील एम.एल.शर्मा कहते हैं कि 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट-2010' के मुताबिक विदेशी धन पाने के लिए भारत सरकार की अनुमति लेना आवश्यक है। यही नहीं, उस राशि को खर्च करने के लिए निर्धारित मानकों का पालन करना भी जरूरी है। कोई भी विदेशी देश चुनावी चंदे या फंड के जरिए भारत की संप्रभुता व राजनैतिक गतिविधियों को प्रभावित नहीं कर सके, इसलिए यह कानूनी प्रावधान किया गया था, लेकिन अरविंद केजरीवाल व उनकी टीम ने इसका पूरी तरह से उल्लंघन किया है। बाबा रामदेव के खिलाफ एक ही दिन में 80 से अधिक मुकदमे दर्ज करने वाली कांग्रेस सरकार की उदासीनता दर्शाती है कि अरविंद केजरीवाल को वह अपने राजनैतिक फायदे के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
अमेरिकी 'कल्चरल कोल्ड वार' के हथियार हैं अरविंद केजरीवाल!
फंडिंग के जरिए पूरी दुनिया में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की अमेरिका व उसकी खुफिया एजेंसी 'सीआईए' की नीति को 'कल्चरल कोल्ड वार' का नाम दिया गया है। इसमें किसी देश की राजनीति, संस्कृति  व उसके लोकतंत्र को अपने वित्त व पुरस्कार पोषित समूह, एनजीओ, ट्रस्ट, सरकार में बैठे जनप्रतिनिधि, मीडिया और वामपंथी बुद्धिजीवियों के जरिए पूरी तरह से प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। अरविंद केजरीवाल ने 'सेक्यूलरिज्म' के नाम पर इसकी पहली झलक अन्ना के मंच से 'भारत माता' की तस्वीर को हटाकर दे दिया था। चूंकि इस देश में भारत माता के अपमान को 'सेक्यूलरिज्म का फैशनेबल बुर्का' समझा जाता है, इसलिए वामपंथी बुद्धिजीवी व मीडिया बिरादरी इसे अरविंद केजरीवाल की धर्मनिरपेक्षता साबित करने में सफल रही।  
एक बार जो धर्मनिरपेक्षता का गंदा खेल शुरू हुआ तो फिर चल निकला और 'आम आदमी पार्टी' के नेता प्रशांत भूषण ने तत्काल कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का सुझाव दे दिया। प्रशांत भूषण यहीं नहीं रुके, उन्होंने संसद हमले के मुख्य दोषी अफजल गुरु की फांसी का विरोध करते हुए यह तक कह दिया कि इससे भारत का असली चेहरा उजागर हो गया है। जैसे वह खुद भारत नहीं, बल्कि किसी दूसरे देश के नागरिक हों?
प्रशांत भूषण लगातार भारत विरोधी बयान देते चले गए और मीडिया व वामपंथी बुद्धिजीवी उनकी आम आदमी पार्टी को 'क्रांतिकारी सेक्यूलर दल' के रूप में प्रचारित करने लगी।  प्रशांत भूषण को हौसला मिला और उन्होंने केंद्र सरकार से कश्मीर में लागू एएफएसपीए कानून को हटाने की मांग करते हुए कह दिया कि सेना ने कश्मीरियों को इस कानून के जरिए दबा रखा है। इसके उलट हमारी सेना यह कह चुकी है कि यदि इस कानून को हटाया जाता है तो अलगाववादी कश्मीर में हावी हो जाएंगे।
अमेरिका का हित इसमें है कि कश्मीर अस्थिर रहे या पूरी तरह से पाकिस्तान के पाले में चला जाए ताकि अमेरिका यहां अपना सैन्य व निगरानी केंद्र स्थापित कर सके।  यहां से दक्षिण-पश्चिम व दक्षिण-पूर्वी एशिया व चीन पर नजर रखने में उसे आसानी होगी।  आम आदमी पार्टी के नेता  प्रशांत भूषण अपनी झूठी मानवाधिकारवादी छवि व वकालत के जरिए इसकी कोशिश पहले से ही करते रहे हैं और अब जब उनकी 'अपनी राजनैतिक पार्टी' हो गई है तो वह इसे राजनैतिक रूप से अंजाम देने में जुटे हैं। यह एक तरह से 'लिटमस टेस्ट' था, जिसके जरिए आम आदमी पार्टी 'ईमानदारी' और 'छद्म धर्मनिरपेक्षता' का 'कॉकटेल' तैयार कर रही थी।
8 दिसंबर 2013 को दिल्ली की 70 सदस्यीय विधानसभा चुनाव में 28 सीटें जीतने के बाद अपनी सरकार बनाने के लिए अरविंद केजरीवाल व उनकी पार्टी द्वारा आम जनता को अधिकार देने के नाम पर जनमत संग्रह का जो नाटक खेला गया, वह काफी हद तक इस 'कॉकटेल' का ही परीक्षण  है। सवाल उठने लगा है कि यदि देश में आम आदमी पार्टी की सरकार बन जाए और वह कश्मीर में जनमत संग्रह कराते हुए उसे पाकिस्तान के पक्ष में बता दे तो फिर क्या होगा?
आखिर जनमत संग्रह के नाम पर उनके 'एसएमएस कैंपेन' की पारदर्शिता ही कितनी है? अन्ना हजारे भी एसएमएस  कार्ड के नाम पर अरविंद केजरीवाल व उनकी पार्टी द्वारा की गई धोखाधड़ी का मामला उठा चुके हैं। दिल्ली के पटियाला हाउस अदालत में अन्ना व अरविंद को पक्षकार बनाते हुए एसएमएस  कार्ड के नाम पर 100 करोड़ के घोटाले का एक मुकदमा दर्ज है। इस पर अन्ना ने कहा, ''मैं इससे दुखी हूं, क्योंकि मेरे नाम पर अरविंद के द्वारा किए गए इस कार्य का कुछ भी पता नहीं है और मुझे अदालत में घसीट दिया गया है, जो मेरे लिए बेहद शर्म की बात है।''
प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और उनके 'पंजीकृत आम आदमी'  ने जब देखा कि 'भारत माता' के अपमान व कश्मीर को भारत से अलग करने जैसे वक्तव्य पर 'मीडिया-बुद्धिजीवी समर्थन का खेल' शुरू हो चुका है तो उन्होंने अपनी ईमानदारी की चासनी में कांग्रेस के छद्म सेक्यूलरवाद को मिला लिया। उनके बयान देखिए, प्रशांत भूषण ने कहा, 'इस देश में हिंदू आतंकवाद चरम पर है', तो प्रशांत के सुर में सुर मिलाते हुए अरविंद ने कहा कि 'बाटला हाउस एनकाउंटर फर्जी था और उसमें मारे गए मुस्लिम युवा निर्दोष थे।' इससे दो कदम आगे बढ़ते हुए अरविंद केजरीवाल उत्तरप्रदेश के बरेली में दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार हो चुके तौकीर रजा और जामा मस्जिद के मौलाना इमाम बुखारी से मिलकर समर्थन देने की मांग की।
याद रखिए, यही इमाम बुखरी हैं, जो खुले आम दिल्ली पुलिस को चुनौती देते हुए कह चुके हैं कि 'हां, मैं पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का एजेंट हूं, यदि हिम्मत है तो मुझे गिरफ्तार करके दिखाओ।' उन पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं, अदालत ने उन्हें भगोड़ा घोषित कर रखा है लेकिन दिल्ली पुलिस की इतनी हिम्मत नहीं है कि वह जामा मस्जिद जाकर उन्हें गिरफ्तार कर सके।  वहीं तौकीर रजा का पुराना सांप्रदायिक इतिहास है। वह समय-समय पर कांग्रेस और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के पक्ष में मुसलमानों के लिए फतवा जारी करते रहे हैं। इतना ही नहीं, वह मशहूर बंग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की हत्या करने वालों को ईनाम देने जैसा घोर अमानवीय फतवा भी जारी कर चुके हैं। 

नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए फेंका गया 'आखिरी पत्ता' हैं अरविंद! 
दरअसल विदेश में अमेरिका, सउदी अरब व पाकिस्तान और भारत में कांग्रेस व क्षेत्रीय पाटियों की पूरी कोशिश नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को रोकने की है। मोदी न अमेरिका के हित में हैं, न सउदी अरब व पाकिस्तान के हित में और न ही कांग्रेस पार्टी व धर्मनिरेपक्षता का ढोंग करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों के हित में।  मोदी के आते ही अमेरिका की एशिया केंद्रित पूरी विदेश, आर्थिक व रक्षा नीति तो प्रभावित होगी ही, देश के अंदर लूट मचाने में दशकों से जुटी हुई पार्टियों व नेताओं के लिए भी जेल यात्रा का माहौल बन जाएगा। इसलिए उसी भ्रष्‍टाचार को रोकने के नाम पर जनता का भावनात्मक दोहन करते हुए ईमानदारी की स्वनिर्मित धरातल पर 'आम आदमी पार्टी' का निर्माण कराया गया है।
दिल्ली में भ्रष्‍टाचार और कुशासन में फंसी कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की 15 वर्षीय सत्ता के विरोध में उत्पन्न लहर को भाजपा के पास सीधे जाने से रोककर और फिर उसी कांग्रेस पार्टी के सहयोग से 'आम आदमी पार्टी' की सरकार बनाने का ड्रामा रचकर अरविंद केजरीवाल ने भाजपा को रोकने की अपनी क्षमता को दर्शा दिया है। अरविंद केजरीवाल द्वारा सरकार बनाने की हामी भरते ही केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा, ''भाजपा के पास 32 सीटें थी, लेकिन वो बहुमत के लिए 4 सीटों का जुगाड़ नहीं कर पाई। हमारे पास केवल 8 सीटें थीं, लेकिन हमने 28 सीटों का जुगाड़ कर लिया और सरकार भी बना ली।''
कपिल सिब्बल का यह बयान भाजपा को रोकने के लिए अरविंद केजरीवाल और उनकी 'आम आदमी पार्टी' को खड़ा करने में कांग्रेस की छुपी हुई भूमिका को उजागर कर देता है। वैसे भी अरविंद केजरीवाल और शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित एनजीओ के लिए साथ काम कर चुके हैं। तभी तो दिसंबर-2011 में अन्ना आंदोलन को समाप्त कराने की जिम्मेवारी यूपीए सरकार ने संदीप दीक्षित को सौंपी थी। 'फोर्ड फाउंडेशन' ने अरविंद व मनीष सिसोदिया के एनजीओ को 3 लाख 69 हजार डॉलर तो संदीप दीक्षित के एनजीओ को 6 लाख 50 हजार डॉलर का फंड उपलब्ध कराया है। शुरू-शुरू में अरविंद केजरीवाल को कुछ मीडिया हाउस ने शीला-संदीप का 'ब्रेन चाइल्ड' बताया भी था, लेकिन यूपीए सरकार का इशारा पाते ही इस पूरे मामले पर खामोशी अख्तियार कर ली गई।
'आम आदमी पार्टी' व  उसके नेता अरविंद केजरीवाल की पूरी मंशा को इस पार्टी के संस्थापक सदस्य व प्रशांत भूषण के पिता शांति भूषण ने 'मेल टुडे' अखबार में लिखे अपने एक लेख में जाहिर भी कर दिया था, लेकिन बाद में प्रशांत-अरविंद के दबाव के कारण उन्होंने अपने ही लेख से पल्ला झाड़ लिया और 'मेल टुडे' अखबार के खिलाफ मुकदमा कर दिया। 'मेल टुडे' से जुड़े सूत्र बताते हैं कि यूपीए सरकार के एक मंत्री के फोन पर 'टुडे ग्रुप' ने भी इसे झूठ कहने में समय नहीं लगाया, लेकिन तब तक इस लेख के जरिए नरेंद्र मोदी को रोकने लिए 'कांग्रेस-केजरी' गठबंधन की समूची साजिश का पर्दाफाश हो गया। यह अलग बात है कि कम प्रसार संख्या और अंग्रेजी में होने के कारण 'मेल टुडे' के लेख से बड़ी संख्या में देश की जनता अवगत नहीं हो सकी, इसलिए उस लेख के प्रमुख हिस्से को मैं यहां जस का तस रख रहा हूं, जिसमें नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए गठित 'आम आदमी पार्टी' की असलियत का पूरा ब्यौरा है।
शांति भूषण ने इंडिया टुडे समूह के अंग्रेजी अखबार 'मेल टुडे' में लिखा था, ''अरविंद केजरीवाल ने बड़ी ही चतुराई से भ्रष्‍टाचार के मुद्दे पर भाजपा को भी निशाने पर ले लिया और उसे कांग्रेस के समान बता डाला।  वहीं खुद वह सेक्यूलरिज्म के नाम पर मुस्लिम नेताओं से मिले ताकि उन मुसलमानों को अपने पक्ष में कर सकें जो बीजेपी का विरोध तो करते हैं, लेकिन कांग्रेस से उकता गए हैं।  केजरीवाल और आम आदमी पार्टी उस अन्ना हजारे के आंदोलन की देन हैं जो कांग्रेस के करप्शन और मनमोहन सरकार की कारगुजारियों के खिलाफ शुरू हुआ था। लेकिन बाद में अरविंद केजरीवाल की मदद से इस पूरे आंदोलन ने अपना रुख मोड़कर बीजेपी की तरफ कर दिया, जिससे जनता कंफ्यूज हो गई और आंदोलन की धार कुंद पड़ गई।''
''आंदोलन के फ्लॉप होने के बाद भी केजरीवाल ने हार नहीं मानी। जिस राजनीति का वह कड़ा विरोध करते रहे थे, उन्होंने उसी राजनीति में आने का फैसला लिया। अन्ना इससे सहमत नहीं हुए । अन्ना की असहमति केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं की राह में रोड़ा बन गई थी। इसलिए केजरीवाल ने अन्ना को दरकिनार करते हुए 'आम आदमी पार्टी' के नाम से पार्टी बना ली और इसे दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के खिलाफ खड़ा कर दिया।  केजरीवाल ने जानबूझ कर शरारतपूर्ण ढंग से नितिन गडकरी के भ्रष्‍टाचार की बात उठाई और उन्हें कांग्रेस के भ्रष्‍ट नेताओं की कतार में खड़ा कर दिया ताकि खुद को ईमानदार व सेक्यूलर दिखा सकें।  एक खास वर्ग को तुष्ट करने के लिए बीजेपी का नाम खराब किया गया। वर्ना बीजेपी तो सत्ता के आसपास भी नहीं थी, ऐसे में उसके भ्रष्‍टाचार का सवाल कहां पैदा होता है?''
''बीजेपी 'आम आदमी पार्टी' को नजरअंदाज करती रही और इसका केजरीवाल ने खूब फायदा उठाया। भले ही बाहर से वह कांग्रेस के खिलाफ थे, लेकिन अंदर से चुपचाप भाजपा के खिलाफ जुटे हुए थे। केजरीवाल ने लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल करते हुए इसका पूरा फायदा दिल्ली की चुनाव में उठाया और भ्रष्‍टाचार का आरोप बड़ी ही चालाकी से कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा पर भी मढ़ दिया।  ऐसा उन्होंने अल्पसंख्यक वोट बटोरने के लिए किया।''
''दिल्ली की कामयाबी के बाद अब अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय राजनीति में आने जा रहे हैं। वह सिर्फ भ्रष्‍टाचार की बात कर रहे हैं, लेकिन गवर्नेंस का मतलब सिर्फ भ्रष्‍टाचार का खात्मा करना ही नहीं होता। कांग्रेस की कारगुजारियों की वजह से भ्रष्‍टाचार के अलावा भी कई सारी समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं। खराब अर्थव्यवस्था, बढ़ती कीमतें, पड़ोसी देशों से रिश्ते और अंदरूनी लॉ एंड ऑर्डर समेत कई चुनौतियां हैं। इन सभी चुनौतियों को बिना वक्त गंवाए निबटाना होगा।''
''मनमोहन सरकार की नाकामी देश के लिए मुश्किल बन गई है। नरेंद्र मोदी इसलिए लोगों की आवाज बन रहे हैं, क्योंकि उन्होंने इन समस्याओं से जूझने और देश का सम्मान वापस लाने का विश्वास लोगों में जगाया है। मगर केजरीवाल गवर्नेंस के व्यापक अर्थ से अनभिज्ञ हैं। केजरीवाल की प्राथमिकता देश की राजनीति को अस्थिर करना और नरेंद्र मोदी को सत्ता में आने से रोकना है।  ऐसा इसलिए, क्योंकि अगर मोदी एक बार सत्ता में आ गए तो केजरीवाल की दुकान हमेशा के लिए बंद हो जाएगी।''
Web Title: who is arvind kejriwal in hindi