Thursday, February 2, 2017

Fwd: विवेकानंद पर विवेकहीन बातें


 

विवेकानंद पर विवेकहीन बातें
पिछले कुछ अरसे में विवेकानंद से खफा तथाकथित बुद्धिजीवियों की एक जमात उभरी है।  इसके ज्यादातर महारथी वामपंथी खेमे से आते हैं। विवेकानंद से उन्हें सबसे बड़ी परेशानी ये है कि विवेकानंद हिंदुत्व के ऐसे प्रतीक हैं जो आज युवाओं के बीच पहले से भी अधिक तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। ऐसे में हिंदुत्व को खुद के लिए चुनौती मानने वाले अब विवेकानंद पर भ्रम पैदा करने के अभियान में जुट गए हैं।
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प्रशांत बाजपेई, पाञ्चजन्य 

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वेदांती बुद्धि और इस्लामी शरीर " भारत के समाज के लिए स्वामी विवेकानंद का यह प्रसिद्ध वाक्य है। गत 12 जनवरी  को उनकी जयंती पर एक प्रसिद्ध हिंदी अखबार ने अपने संपादकीय पृष्ठ पर स्वामीजी के इस वचन को तोड़ते-मरोड़ते हुए 'इस्लामी शरीर और वैज्ञानिक बुद्धि'  शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया। देखते ही माथा ठनका कि ये कैसी प्रमाणिकता है जो एक इतिहास पुरुष के बकायदा दस्तावेजीकृत बयान को अपनी वैचारिक रूढ़ि के अनुसार विकृत करती है , और ये कैसी बुद्धिजीविता है जिसे इस्लामी शरीर तो स्वीकार है लेकिन वेदांती बुद्धि नहीं ?

सबसे पहले यह जान लेना ठीक होगा कि विवेकानंद का वास्तविक वचन और उनका अभिप्राय क्या था। 10 जून 1898 को अल्मोड़ा से स्वामी विवेकानंद ने मुहम्मद सरफ़राज़ हुसैन को लिखा - "हमारी मातृभूमि के लिए एक ही आशा है वेदांती बुद्धि और इस्लामी शरीर। " ( देखें- पत्रावली, विवेकानंद साहित्य संचयन , रामकृष्ण मठ , नागपुर ) ऐसा कहने से स्वामीजी का क्या आशय था यह भी उन्होंने इस पत्र के मध्य भाग में स्पष्ट किया है जब वे कहते हैं कि इस्लाम के अनुयायी  समानता के भाव का अंश रूप में पालन करते हैं परंतु उसके गहरे अर्थ से अनभिज्ञ हैं, उसे ( मानव मात्र की समानता के तत्व को ) हिंदू साधारणतः स्पष्ट रूप से समझते हैं ('परंतु पूरी तरह आचरण नहीं कर रहे हैं ', संकेत जातिगत रूढ़ियों और तब प्रचलित कुरीतियों की ओर है।) इस्लाम के अनुयायियों द्वारा "समानता के सिद्धांत का अंश रूप में पालन" से अभिप्राय स्पष्ट करते हुए 'विश्वधर्म का आदर्श' नामक प्रसिद्ध भाषण में स्वामीजी कहते हैं - "मुसलमान विश्वबंधुत्व का शोर मचाते हैं।  किन्तु वस्तुतः वे भ्रातृभाव से कितनी दूर हैं।  जो मुसलमान नहीं है, वे भ्रातृ-संघ में शामिल नहीं किये जाएंगे।  उनके गले काटे जाने ही की अधिक सम्भावना है।  ईसाई भी विश्वबंधुत्व की बातें करते हैं; किन्तु (उनकी मान्यता के अनुसार )जो ईसाई नहीं है, वह (मृत्यु के बाद ) अवश्य ही ऐसे एक स्थान में जाएगा, जहाँ अनंतकाल तक वह (नर्क की ) आग से झुलसाया जाए।"

वेदांत दर्शन क्या है इसे 12 नवंबर 1897 को उन्होंने लाहौर में युवकों के सामने दिए गए अपने भाषण में समझाते  हुए कहा था कि " भारतीय  मन को बाहरी जगत से (अर्थात भौतिक अथवा सांसारिक पदार्थों से ) जो कुछ मिलना था , मिल चुका था, परंतु उससे इसे (भारत के मन को ) तृप्ति नहीं हुई। अनुसंधान के लिए वह और आगे बढ़ा। समस्या के समाधान के लिए उसने अपने में ही गोता लगाया और तब यथार्थ  उत्तर मिला। वेदों के इस भाग का नाम है उपनिषद् या वेदांत या आरण्यक या रहस्य।" आगे विवेकानंद समझाते हैं कि भारत के विभिन्न मत संप्रदायों में प्रचलित कर्म-काण्ड, अनुष्ठानऔर विभिन्न पूजा पद्धतियों आदि के सार को समझने के लिए वेदांत की आवश्यक्ता है। ऐसे में वेदांती बुद्धि को वैज्ञानिक बुद्धि बनाकर उसे इस्लामी शरीर से जोड़ने की 'सेकुलर' ज़रुरत को समझा जा सकता है। प्रामाणिकता और ईमानदारी का पूछना ही क्या, आखिर प्रमाणपत्र बाँटने वाले भी यही लोग हैं।

पिछले कुछ अरसे में विवेकानंद से खफा तथाकथित बुद्धिजीवियों की एक जमात उभरी है।  इसके ज्यादातर महारथी वामपंथी खेमे से आते हैं। विवेकानंद से उन्हें सबसे बड़ी परेशानी ये है कि विवेकानंद हिंदुत्व के ऐसे प्रतीक हैं जो आज युवाओं के बीच पहले से भी अधिक तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। ऐसे में हिंदुत्व को खुद के लिए चुनौती मानने वाले अब विवेकानंद पर भ्रम पैदा करने के अभियान में जुट गए हैं। आधी-अधूरी समझ लेकर राजनैतिक दृष्टिकोण से टीका-टिप्पणियाँ  की जा रही हैं। आधे-अधूरे उद्धरणों को लेकर तमाशा खड़ा करने के प्रयास हो रहे हैं। कुछ समय पहले एक किताब आई 'कॉस्मिक लव एंड ह्यूमन इम्पैथी : स्वामी विवेकानंदाज रिसेंटमेन्ट ऑफ़ रिलीजन '। पुस्तक के लेखक की पहली शिकायत या आरोप है कि विवेकानंद ने हिंदुत्व पर सारा ज़ोर दिया है जबकि उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस के वचनों के संग्रह रामकृष्ण कथामृत में हिंदू शब्द नहीं आता।

आरोपकर्ता लेखक ने यदि थोड़े से सहज ज्ञान का उपयोग किया होता, या वैसी उनकी नीयत होती तो उन्हें ध्यान में आ सकता था कि रामकृष्ण परमहंस हिंदुओं के छोटे समूह के बीच ही बोल रहे थे, तीर्थयात्रा के अतिरिक्त वे कभी बाहर भी नहीं निकले, अतः अलग से हिंदू संबोधन के प्रयोग का औचित्य नहीं था। साथ ही परमहंस की बातों का केंद उनके शिष्यों की व्यक्तिगत आध्यात्मिक साधना और इस मार्ग की कठिनाइयों आदि के बारे में रहा है। जबकि विवेकानंद वैश्विक श्रोताओं को संबोधित कर रहे थे। उनकी सार्वजनिक चर्चाओं का सारा ज़ोर सामाजिक है, अतः उन्होंने भारत के सारे विचार और भाव समूह को संयुक्त रूप से हिंदू कहकर संबोधित किया है। जब वो व्यक्तिगत आध्यात्मिक साधना की बात करते हैं तब हिंदू या यूरोपीय जैसी भौगोलिक या सांस्कृतिक पहचानों की बात नहीं करते। इसका प्रमाण हैं उनकी राजयोग, प्रेमयोग और भक्तियोग जैसी रचनाएँ।

लेखक की दूसरी शिकायत है कि विवेकानंद ने हिंदुत्व को वैश्विक उपासना पद्धति (यूनिवर्सल फेथ ) के रूप में प्रस्तुत किया है। ये आरोप भी झूठा है। इसे विस्तार से समझने की ज़रुरत है। पहली बात ये है कि हिंदुत्व इस्लाम और ईसाइयत जैसा 'फेथ ( विश्वासियों का समूह) नहीं है। यहाँ न एक किताब है , न एक पैगम्बर न ही एक पूजा पद्धति। यहाँ हज़ारों सालों से गुरु और शिष्य अपनी इच्छानुसार अलग-अलग  साधना पद्धतियों की खोज करते आये हैं। गीता में ही कृष्ण ने अनेक उपासना पद्धतियों की शिक्षा दी है जिसमें उन्होंने प्रेमयोग, भक्तियोग, राजयोग, कर्मयोग आदि को समझाया है। योग के अंदर भी अनेकों धाराएँ  विकसित हुई हैं। सभी ने महान गुरुओं को जन्म दिया है। इसी परंपरा को विवेकानंद ने हिंदुत्व कहा है, जैसा कि उनके शिकागो के भाषण से स्पष्ट है। भारत की वैदिक परंपरा और वेदांत उपनिषद् आदि भी व्यक्ति के स्वभाव और रूचि के अनुसार अपना मार्ग चुनने को कहते हैं।
सभी लोग एक ही ढंग से चलें ऐसा आग्रह ही सारे अनर्थों की जड़ है।

इस बारे में विवेकानंद विश्वधर्म का आदर्श नामक भाषण में कहते हैं - "बहुत्व में एकत्व का होना सृष्टि का विधान है। हम सब लोग मनुष्य होते हुए भी परस्पर प्रथक हैं। मनुष्य जाति के एक अंश के रूप में मैं और तुम एक  हैं, किन्तु व्यक्ति के रूप में मैं तुमसे पृथक  हूँ । पुरुष होने से तुम स्त्री से भिन्न हो, किन्तु मनुष्य होने के नाते स्त्री और पुरुष एक ही हैं।ईश्वर है वह विराट सत्ता-इस विचित्रता भरे जगत  का चरम एकत्व।  उस ईश्वर में हम सभी एक हैं, किन्तु हमारे प्रत्येक बाहरी कार्य और चेष्टा में यह भेद सदा ही विद्यमान रहेगा। इसलिए विश्व धर्म का यदि यह अर्थ लगाया जाए कि एक प्रकार के विशेष मत (पंथ) में संसार के सभी लोग विश्वास करें, तो यह सर्वथा असंभव है। यह कभी नहीं हो सकता। ऐसा समय कभी नहीं आएगा, जब सब लोगों का मुँह एक रंग का हो जाए और यदि हम आशा करें कि समस्त संसार एक ही पौराणिक तत्व में विश्वास करेगा, तो यह भी असंभव है, यह कभी नहीं हो सकता।  फिर, समस्त संसार में कभी भी एक प्रकार की अनुष्ठान पद्धति प्रचिलत हो नहीं सकती । ऐसा किसी समय हो नहीं सकता,  हो भी जाए, तो सृष्टि लुप्त हो जाएगी। कारण, विविधता ही जीवन का मूल है।"

विश्व में सर्वसमावेशक सोच और गहरी समझ विकसित करने की आवश्यक्ता बतलाते हुए विवेकानंद कहते हैं कि यह " सब प्रकार की मानसिक अवस्था वाले लोगों के लिए उपयोगी हो; इसमें ज्ञान, भक्ति, योग और कर्म समानभाव  से रहेंगे।  यदि कॉलेज से वैज्ञानिक और भौतिकशास्त्री  आएँ तो वे तर्क-वितर्क पसंद करेंगे।  उनको  युक्ति-तर्क करने दो, अंत में वे एक ऐसी स्थिति पर पहुंचेंगे, जहाँ से युक्ति-तर्क की धारा छोड़े बिना वे और आगे बढ़ ही नहीं सकते, वो ये (स्वयं ही) समझ लेंगे।....   इसी तरह यदि कोई योगप्रिय व्यक्ति आए, तो हम उनकी आदर के साथ अभ्यर्थना करके वैज्ञानिक भाव से मन का विश्लेषण कर देने और उनकी आँखों के सामने उसका प्रयोग दिखाने को प्रस्तुत रहेंगे।  यदि भक्त लोग आएँ, तो हम उनके साथ एकत्र बैठ कर भगवान के नाम पर हँसेंगे और रोएंगे, प्रेम का प्याला पीकर उन्मत्त हो जाएंगे। यदि एक पुरुषार्थी कर्मी आए, तो उसके साथ पूरी शक्ति से काम करेंगे।  भक्ति, योग, ज्ञान और कर्म का इस प्रकार का समन्वय विश्वधर्म का अत्यंत निकटतम आदर्श होगा।"

स्वामी विवेकानंद द्वारा व्यक्त मूलभूत एकता का यह विचार ही उपनिषद् या वेदांत या आरण्यक या रहस्य  के रूप में हज़ारों साल पहले अभिव्यक्त हुआ है। इस विचार को पूरी ताकत से व्यवहार में उतारने को ही उन्होंने "वेदांती बुद्धि और इस्लामी शरीर" कहकर व्यक्त किया है।
एक अंग्रेजी अखबार ने मानव की मूलभूत एकता का चिंतन करने वाले विवेकानंद को जातिवाद का प्रतीक बतलाया। 'कॉस्मिक लव एंड ह्यूमन इम्पैथी ....' के लेखक ने विवेकानंद के विचारों को तोड़मरोड़कर उन्हें जातिवाद का समर्थक बतलाया है जो 'ब्राह्मण जाति के सामाजिक प्रभुत्व की वकालत करते हैं। इससे बड़ा झूठ कुछ हो नहीं सकता। विवेकानंद ने साफ़ कहा है कि जन्म के आधार पर जाति का अभिमान करना व्यर्थ है। और वैदिककाल में वर्णो के विभाजन का आधार व्यक्तिगत स्वभाव था न कि किसी घर में जन्म लेना। उनके अनुसार ब्राह्मण अर्थात सत्य के अनुसंधान के लिए सबकुछ दांव पर लगा देने वाला। और इसीलिए उन्होंने 'ब्राह्मणत्व को मानवता का सर्वोच्च आदर्श बतलाया। यह ब्राह्मणत्व गुरु रैदास और कबीर में, गुरु गोविंद और रामकृष्ण परमहंस में झलकता है। 3 जनवरी 1895 को, शिकागो से उन्होंने जस्टिस सुब्रमण्यम अय्यर को लिखा - "अमेरिका में यथार्थ जाति के विकास के लिए सबसे अधिक सुविधा है। इसलिए अमेरिका वाले बड़े (सफल ) हैं।" अब अमेरिका में कौनसी जाति प्रचलित है ? वहाँ तो एक ही व्यवस्था है - व्यक्ति अपनी रूचि और योग्यता के अनुसार काम करे।
अपनी जाति का अभिमान करने और दूसरों को कम समझने वालों पर उन्होंने तीखी चोट करते हुए एक लेख लिखा है - "भारत की उच्च जातियों के प्रति।" इसमें वो लिखते हैं -
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कितना भी 'डमडम' कह कर गाल बजाओ, तुम ऊँची जातवाले क्या जीवित हो ? तुम लोग हो दस हजार वर्ष पूर्व के ममी ! जिनकी 'सचल श्मशान' कहकर तुम्हारे पूर्व-पुरुषों ने घृणा की है। भारत में जो कुछ वर्तमान जीवन है, वह उन्हीं (महान पूर्वजों के कारण) में है और सचल श्मशान हो तुम लोग। तुम्हारे घर-द्वार म्यूज़ियम हैं, तुम्हारे आचार-व्यवहार, चाल-चलन देखने से जान पड़ता है, बड़ी दादी के मुँह से कहानियाँ सुन रहा हूँ। तुम्हारे साथ प्रत्यक्ष वार्तालाप करके भी घर लौटता हूँ, तो जान पड़ता है, चित्रशाला में तसवीरें  देख आया। इस माया के संसार की असली प्रहेलिका, असली मरू-मरीचिका तुम लोग हो भारत के उच्च वर्णवाले।"
भारत के वंचित वर्ग को समर्थ बनाने का आह्वान करते हुए वो आगे लिखते हैं -
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फिर एक नवीन भारत निकल पड़े।  निकले हल पकड़कर, किसानों की कुटी भेदकर, जाली, माली, मोची, मेहतरों की झोपड़ियों से।  निकल पड़े बनियों की दुकानों से, भुजवा के भाड़ के पास से, कारखाने से, हाट से, बाजार से । निकले झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से। इन लोगों ने सहस्र-सहस्र वर्षों तक नीरव अत्याचार सहन किया है- उससे पायी है अपूर्व सहिष्णुता।  सनातन दुःख उठाया, जिससे पायी है अटल जीवनी-शक्ति।  ये लोग मुट्ठी भर सत्तू खाकर दुनिया उलट  सकेंगे।  आधी रोटी मिली, तो तीनों लोक में इतना तेज न अटेगा।  ये रक्तबीज के प्राणों से युक्त हैं।  और पाया है सदाचार-बल, जो तीनों लोक में नहीं है। इतनी शांति, इतनी प्रीति, इतना प्यार, बेजबान रहकर दिन-रात इतना खटना और काम के वक्त सिंह का विक्रम।"
वो कहते हैं कि अपने झूठे अभिमान को त्यागकर कान लगाकर सुनो तुम्हें भविष्य के भारत की आवाज़ सुनाई पड़ेगी - "अतीत के कंकाल-समूह ! - यही है तुम्हारे सामने तुम्हारा उत्तराधिकारी भावी भारत।  वे तुम्हारी रत्नपेटिकाएँ, तुम्हारी मणि की अंगूठियाँ - फेंक दो इनके बीच; जितना शीघ्र फेंक सको, फेंक दो; और तुम हवा में विलीन हो जाओ, अदृश्य हो जाओ, सिर्फ कान खड़े रखो। तुम ज्यों ही विलीन होगे, उसी वक्त सुनोगे, कोटि कंठों से निनादित त्रैलोक्यकम्पनकारिणी भावी भारत की उद्बोधन  ध्वनि 'वाहे गुरु की फतह!'

सत्य को जानने के लिए नीयत का भी बड़ा महत्व है। आश्चर्य क्या, कि विवेकानंद की आलोचना में पूरी किताब लिखने वाले लिक्खाड़ों को उनके ये वचन सुनाई नहीं पड़ते।

उन्हें चुभता है जब विवेकानंद कहते हैं - "वेदांत दर्शन का एक ही उद्देश्य है और वह है - एकत्व की खोज।  हिन्दू लोग किसी विशेष के पीछे नहीं दौड़ते, वे तो सदैव सर्वमान्य की, यही क्यों, सर्वव्यापी सार्वभौमिक की खोज करते हैं। 'वह क्या है, जिसके जान लेने से सब कुछ जाना जा सकता है ?'  यही उनका विषय है। जिस प्रकार मिट्टी के एक ढेले को जान लेने पर जगत की सारी मिट्टी को जान लिया जा सकता है, उसी प्रकार ऐसी कौन सी वस्तु है, जिसे जान लेने पर जगत की सारी वस्तुएँ जानी जा सकती हैं। उनकी यही एक खोज है, यही एक जिज्ञासा है।"

अब हिंदू के अलावा दूसरा कौनसा शब्द है जिससे इस भारतीय विचार को बतलाया जाय। वेदों में हिंदू शब्द नहीं है , उपनिषद् गीता आदि में भी नहीं है। हज़ारों साल पहले इस तरह के निरूपण की आवश्यक्ता ही नहीं थी। जब सारी दुनिया के साथ तुलना शुरू हुई तब भारत की संस्कृति, यहाँ के  विचार, मूलभूत संस्कार को हिंदू कहा जाने लगा। भौगोलिक पहचान के रूप में भारत को हिंदुस्थान या हिंदुस्तान भी कहा जाने लगा । अब किसी की राजनीति पर चोट पड़ती हो तो पड़े। किसी को चुभता हो तो चुभे।  विवेकानंद डंके की चोट पर सत्य बोलते हैं। बेधड़क, बेलाग , बिना द्वेष के।

 

मद्रास के हिंदुओं द्वारा भेजे गए अभिनंदन पत्र का उत्तर देते हुए उन्होंने लिखा - "अब पांसे पलट गए हैं। जो हिंदू निराशा के आँसू बहाता हुआ अपने पुराने घर को आतताइयों द्वारा जलाई गई आग से घिरा हुआ देख रहा था, आज जबकि आधुनिक विचार के प्रकाश ने धुँए के अँधेरे को हटा दिया है, तब वही हिंदू देख रहा है कि उसका अपना घर पूरी मजबूती के साथ खड़ा है और शेष सब या तो मर मिटे या अपने -अपने घर हिंदू नमूने के अनुसार नए सिरे से बना रहे हैं।" विवेकानंद के ये वचन आज वर्तमान बनकर हमारे सामने हैं। दुनिया में योग का डंका बज रहा है। दुनियाभर में ध्यान की कक्षाएँ चल रही हैं। वैश्विक समाज का  प्रबुद्ध वर्ग मत-मतांतरों और संप्रदायों की सीमा लांघकर सत्य को स्वीकार कर रहा है।भारत की नयी पीढ़ी उत्साह के साथ आधुनिक और पुरातन का मेल बिठाने को प्रतिबद्ध दिख रही है। सत्य के लिए संघर्ष को तैयार है। यही है वेदांती बुद्धि और इस्लामी शरीर।

 

अमेरिका निवासी बहनों तथा भाइयों

 

11 सितंबर 1893 को विश्व पंथ सभा, शिकागो, में अपने विश्वप्रसिद्ध भाषण में स्वामी विवेकानंद ने हिंदुत्व की उदार परंपरा और सार्वभौमिकता को रेखांकित किया। ये उद्बोधन इतना प्रभावी और अभिनव था कि कुछ ही मिनटों के अंदर सदियों का हिसाब हो गया।

संबोधन में ही उन्होंने आधे अमरीकी समाज की दुखती रग को स्पर्श कर लिया था। उस समय अमरीकी महिलाएँ अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहीं थीं। 1878 में अमरीकी संसद में स्त्रियों को मताधिकार देने का प्रस्ताव लाया गया , लेकिन सदन में गिर गया। अमरीका में  स्त्री अधिकारों के लिए संघर्ष की लहर अब दूसरे उग्र चरण की ओर बढ़ रही थी। ऐसे समय जब एक तेजस्वी हिंदू सन्यासी ने स्त्रियों को प्रथम सम्मान देते हुए " अमरीका निवासी बहनो तथा भाइयों" कहा, तो सभाकक्ष तालियों  गड़गड़ाहट से गूँज उठा। उन्होंने भाषण की शुरुवात स्वयं को हिन्दू परंपरा का  प्रतिनिधि बतलाते हुए इस प्रकार की -

"आपने जिस सौहार्द्र और स्नेह के साथ हमारा यहाँ स्वागत किया हैं उसके प्रति आभार प्रकट करने के लिए खड़े होते हुए मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से भर गया है। संसार में सन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ, मैं आपको सभी पूजापद्धतियों की माता (हिंदू परंपरा ) की ओर से धन्यवाद देता हूँ और सभी सम्प्रदायों और मतों के करोड़ो हिन्दुओं की ओर से भी आपको धन्यवाद देता हूँ."

इसके बाद उन्होंने हज़ारों वर्ष से चली आ रही सहिष्णुता की हिन्दू परंपरा का परिचय देते हुए कहा- "मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन  वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने इस बात का उल्लेख किया और आपको यह बतलाया कि सहिष्णुता का विचार पूरे विश्व में पूरब के देशों से फैला है। मैं एक ऐसी परंपरा का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने दुनिया को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति दोनों की ही शिक्षा दी है।  हम लोग सभी पंथों  के प्रति ही केवल सहनशीलता में ही विश्वास नहीं करते बल्कि सारे पंथों  को सत्य मान कर स्वीकार करते हैं।"

भारत के इतिहास की दो प्रसिद्ध घटनाएँ, जो भारत के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम से गायब रही हैं, का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा - "मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस धरती के सभी पंथों और देशों के पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है।  मुझे यह बताते हुए भी गर्व होता है कि हमने अपने ह्रदय में उन यहूदियों को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था। मैं एक ऐसी परंपरा का अनुयायी होने में गर्व अनुभव करता हूँ जिसने महान जरथ्रुष्ट (पारसी) जाति  के अवशिष्ट अंश को शरण दी (663 ईसवी में, जब अरब हमलावरों ने ईरान पर आक्रमण किया था ) और जिसका पालन वह अभी  भी कर रहा है।"

संसार की सभी पूजा पद्धतियों का सम्मान करने के हिंदू संस्कार को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा -

"भाईयो मैं आप लोगों को एक श्लोक की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ जिसे मैं बचपन से स्मरण करता आ रहा हूँ और जिसे प्रतिदिन लाखों-करोड़ों मनुष्यों ( हिंदुओं ) द्वारा दोहराया जाता है.

संस्कृत श्लोक-:
"रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम् ।
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।।"


अर्थात 'जैसे विभिन्न नदियाँ अलग-अलग स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं ठीक उसी प्रकार से अलग-अलग रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जाने वाले लोग अन्त में तुझमें ( ब्रह्म या परमात्मा ) में ही आकर मिल जाते हैं।' यह सभा जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है, स्वतः ही गीता के इस अदभुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है.

"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।"

 

अर्थात जो कोई मेरी ओर आता है वह चाहे किसी प्रकार से हो,मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग अलग-अलग रास्तों द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं। 

साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर मज़हबी कट्टरता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे इस धरती को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारम्बार मानवता के खून से नहलाती रही हैं और कई सभ्यताओं का नाश करती हुई सभी देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं.

यदि ये वीभत्स राक्षसी न होती तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता।  पर अब उनका समय आ गया है और मैं अंतःकरण  से यह आशा  करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टा ध्वनि हुई है वह समस्त मज़हबी कट्टरता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होने वाले सभी उत्पीड़नों  का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का  मृत्युनिनाद सिद्ध हो।"

यही स्वामी विवेकानंद का हिंदुत्व है, जिसे लेकर कुछ छद्म बुद्धिजीवियों के पेट में मरोड़ उठती रहती है। हिंदुत्व की इसी परिभाषा को लेकर पिछली सदी में हिंदुत्व की लहर उठी है, जो दिन पर दिन ताकतवर होती जा रही है। इसी उदार विचार को 'सांप्रदायिकता' और 'सेकुलरिज़्म के लिए खतरा' बतलाने को  सेकुलरिज़्म के स्वयंभू ठेकेदारों में होड़ लगी रहती है। इसीलिए वामपंथियों के एक खेमे को अब विवेकानंद को धुँधला करने, उनकी बातों को तोड़मरोड़ कर विवाद खड़ा करने की ज़रुरत महसूस हो रही है।

 

Tuesday, January 24, 2017

માતૃભાષા

જા તારું છોકરું માતૃભાષા ને સાવ ભૂલી જાય...'
રશિયામાં બે સ્ત્રીઓ ઝઘડે તો શ્રાપ આપે કે,
આરતી પટેલે માતૃભાષા વિષય પર વાત કરી

માતૃભાષાનોમહિમા કરવાનો પ્રસંગ હતો જેમાં જાણીતા આર.જે. અને કલાકાર આરતી પટેલ જોડાયા હતાં. કનોરિયા સેન્ટર ફોર આર્ટમાં શુક્રવારે 'ભાષા મારી ગુજરાતી છે' અંતર્ગત આરતી પટેલની ટોક યોજાઈ હતી. માતૃભાષા અભિયાન, જીએલએફ અને ક્રિએટીવ યાત્રા ડોટ કોમના ઉપક્રમે યોજાયેલી ટોકમાં આરતી પટેલે નવી જનરેશનને માતૃભાષા તરફ વાળવાની વાત કરી હતી. તેમણે જો દરેક વ્યક્તિને માતૃભાષા આવડતી હોય તો તેના સફળ થવાના ચાન્સ વધી જાય છે તેમ કહ્યું હતું.
આરતી પટેલે કહ્યું કે, 'રશિયામાં દાગેસ્તાન નામનો વિસ્તાર છે જ્યાં આજે પણ બે સ્ત્રીઓ ઝગડે તો એવો શ્રાપ આપે છે કે, જા તારું છોકરું માતૃભાષા ને સાવ ભૂલી જાય. છે માતૃભાષાનું મહત્વ. માતૃભાષાની એવી તો કેવી અસર થતી હશે કે સ્ત્રીઓ એક શ્રાપ તરીકે તેને ગણે છે. માતૃભાષા આપણને આપણા રૂટ્સ સુધી જોડાયેલા રાખે છે. શું આપણે માં બદલી શકીએ ખરા? આપણે જેમ આપણી માને બદલી શકીએ તેવી રીતે માતૃભાષાને પણ બદલી શકીએ. અમદાવાદ કે દરિયાપારમાં પણ માતૃભાષાને ચાહવાવાળો વર્ગ ઓછો નથી. હા હવે સમય બદલાયો છે તેમ તેમ જેમ મા દેશી લાગવી જોઈએ તેમ આપણી માતૃભાષા પણ દેશી લાગવી જોઈએ તે જોવાનું કામ આપણા બધાનું છે.'

Wednesday, December 21, 2016

भारत का जन्म ही दुनिया को धर्म की समझ देने के लिए हुआ है - डॉ. मोहन भागवत जी



वड़ोदरा (गुजरात) में सोमवार को आयोजित महानगर एकत्रीकरण बोलते हुए मा. सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी ने कहाँ कि पूर्ण गणवेश में हमलोगों का यह एकत्रीकरण हमारी 90 सालों से आदत है.  हमलोग ऐसे कार्यक्रम करते ही रहते है परन्तु हम ऐसे कार्यक्रम क्यों करते है ?  लम्बे समय तक कोई कर्मकांड करते रहने से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता.  हम जो भी कृति करते है उसके पीछे एक विचार होता है.

हम शारीरिक एवं बौद्धिक दोनों प्रकार के कार्यक्रम करते है बौद्धिक कार्यक्रम भाषण नहीं होता, वह वहां पर बैठे सभी स्वयंसेवको का सामूहिक चिंतन होता है. ऐसा ही एक कार्यक्रम सम्पन करने के लिए हमसब आज यहाँ पर एकत्रित आये है. आज संघ का नाम समाज जानता है संकट के समय संघ के स्वयंसेवक जो काम करते है उसके कारण संघ के लोग अच्छे होते है ऐसा आज समाज मानता है.

आज यहाँ तरुण, व्यस्क, प्रोढ़ सभी आयु के स्वयंसेवक है उनसे पूछा जाय आप संघ के स्वयंसेवक क्यों बने तो कहेंगे कि हमें संघ के स्वयंसेवक का काम पसंद आया इसलिए हम स्वयंसेवक बने. लेकिन संघ के स्वयंसेवक हमको पसंद आने वाले काम करते ही क्यों है? इसका कारण संघ की पद्धति है, संघ की जानकारी हमें लोगो को देनी चाहियें. आज 1,60,000 सेवाकार्य समाज की सहायता से चल रहे है. आज समाज जीवन के हर क्षेत्र में संघ के स्वयंसेवक है और वहां पर जो उनका कार्य है उसको समाज अच्छा मानता है. परन्तु स्वयंसेवको के द्वारा चलाये गए ये सारे कार्य संघ से अलग स्वतंत्र स्वायत्त कार्य है. संघ का काम ऐसे स्वयंसेवको को तैयार करने का है.

देश के सामने अनेक समस्याए रहती है संघ के स्वयंसेवक का स्वभाव समस्याओ के समाधान का है इसीलिए समाज स्वयंसेवक के कार्यो को अच्छा मानता आया है. समाज की बहुत सी समस्याए रहती है जिसका समाधान समाज द्वारा ही होता है. उसके लिए योग्य समाज बनाना होता है और योग्य समाज बनाने के लिए समाज में वातावरण बनाना पड़ता है और योग्य वातावरण  बनाने वाले व्यक्ति खड़े करने पड़ेगे. समाज में भलाई का कार्य करने वाले व्यक्तिओ कि कमी नहीं है परन्तु समाज के पास पहुचने वाला व्यक्ति चाहिए और वह व्यक्ति ऐसा चाहिए जिसपर समाज को भरोसा हो.

समाज में कई समस्याए ऐसी होती है जिसके लिए लंबे समय तक धेर्यपूर्ण व्यवहार करना पड़ता है. अंतिम परिणाम पाने तक सतत काम करने की मनोवृति होनी चाहिए यह आदत होनी चाहियें और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस प्रकार की आदत करने की कार्यपद्धति का मार्ग है. संघ और कुछ नहीं करता संघ ऐसी आदत अपने स्वभाव में परिवर्तित करने वाले स्वयंसेवको का निर्माण करता है. और पिछले 90 सालो से यही करता रहा है जिसके परिणामस्वरूप बहुत सारे स्वयंसेवक तैयार हुए है जो आज राष्ट्रकार्य में लगे हुए है और जिनका कार्य आज समाज के सामने है.

लेकिन यदि वास्तविक रूप से संघ को समझना है तो प्रत्यक्ष संघ को ही देखना होगा. संघ में मिलता कुछ नहीं है सब देना ही पड़ता है. यदि कुछ अपेक्षा के साथ संघ में आते है तो योग्य यही है कि संघ की छाया से भी दूर रहिये क्योकि यहाँ कुछ भी मिलने वाला नहीं है. कुछ न कुछ देना ही पड़ेगा. संघ समर्पण की भावना विकसित करता है. संघ में स्वयंसेवक के विचार और कृति में अंतर नहीं होता. संघ में भाषा जाति के अंतर के बिना समान व्यवहार किया जाता हैं . आज विश्व में धर्म के नाम पर लड़ाई हो रही है. भारत का जन्म ही दुनिया को धर्म की समझ देने के लिए हुआ है. संघ कभी प्रतिक्रिया नहीं देता, हम सभी एक ही ही आत्मा परमात्मा के अंश है हमें एक दुसरे का सन्मान करना चाहिए शोषण नहीं.

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में उपस्थित रहे. इस अवसर पर वड़ोदरा विभाग संघचालक श्री बलदेवभाई प्रजापति, वड़ोदरा महानगर संघचालक डॉ. वृजेशभाई शाह तथा जिला संघचालक डॉ. महेंद्र पटेल मंच पर उपस्थित रहे.

Harish Vyas
98241 68221

Saturday, November 12, 2016

Fwd: The saffron Muslim



 

 

 

 

 

                            The saffron Muslim

 

Danish Raza, Hindustan Times, New Delhi Jan 19, 2014 12:14 IST

 

 

A week before the 65th Independence Day, Imran Chaudhry, a PhD student at the national capital's Jamia Millia Islamia university did something which would pit him against everyone in his neighbourhood in the walled city of old Delhi. Chaudhry got posters pasted on the walls of the labyrinthine lanes of the primarily minority-dominated area, informing locals that senior Rashtriya Swayam Sewak Sangh (RSS) leader Indresh Kumar would be addressing a gathering in the area on August 15.

Retaliatory posters asking people to boycott the event appeared within hours. Chaudhry remembers the snide remarks of his acquaintances. "One of them commented that those who had been baying for the blood of the Muslim community were now coming here to address them," he says. To understand Chaudhry's motives, a senior neigbourhood cleric met him privately and chided him saying, "It's understandable if you prefer the BJP over other political parties; but the RSS?"

As the national co-convener of the Muslim Rashtriya Manch (MRM) - a social organisation floated by the RSS with more than 10,000 members across the country -

 

Chaudhry says he is now used to such jibes from members of his community. "Through the MRM, the RSS has extended an olive branch to the Muslim community. It's the duty of the Muslims to reciprocate and I am doing just that," says the 40-year-old. In December 2010, when Indresh Kumar's name was associated with the Mecca Masjid blast, Chaudhry was at the forefront of a demonstration at the capital's Jantar Mantar, defending the Sangh leader, who, he says, is like a father figure to him. "I couldn't back out when he needed us the most," he says.

Soon after joining the MRM, Irfan Chaudhry, All India co-convener of the organisation, faced lot of criticism from various quarters. Now his family and friends realise that he is a good job of bringing the two communities together, he says. (Raj K Raj/HT Photo)

The idea of the MRM, the Sangh's only body to reach out to Muslims, was conceptualised in December 2002 - 88 years after the RRS was born - when the late K Sudarshan, former RSS chief, addressed a gathering at the Chanakyapuri residence of Nafisa Hussain, then member of the National Commission for Women.

 

 

He had expressed concern that young Muslims were being targeted on terror charges across the globe and to an audience of approximately a dozen Muslims, a few of them BJP sympathizers, he said he knew the spirit of Islam did not propagate the ideology of Jihad as it was interpreted by terrorists.

"After the programme, we brainstormed on how to remove misconceptions about each others' religions and decided to form a social organisation called 'Mai (Mother) Hindustan' as all Indians are the children of Mother India," recalls 49-year-old Dr Tahir Hussain, professor of geography at Mekelle University, Ethiopia, and one of the founder members of the MRM. The organisation's name was later changed to Rashtriya Muslim Manch and finally to Muslim Rashtriya Manch (MRM).
The MRM now has a presence in 22 states.

 

 

Friends with benefits 
MRM members do not follow the drill in sangh shakhas or wear the khaki half pants that are mandatory for all RSS members.
None of the MRM members would admit that propagating the RSS ideology of a Hindu Rashtra is on their agenda. "The idea is to bring the two communities together," says Hussain.

Dr Hussain, a professor with the Mekelle University, Ethiopia, believes in the idea of a secular India. "During riots, it is not about Hindus and Muslims. Whoever is killed is an Indian and whoever kills, is a devil," he says. (Raj K Raj/HT Photo)

However, the RSS cannot be extricated from the MRM. From time to time, the organisation has spearheaded campaigns such as the one calling for a ban on cow slaughter to carry out the message of its parent body. Last October, Hussain, who is from Mewat district in Haryana, organised a panchayat of 12 villages there, to ban cow slaughter. "If it is about eating meat, we have other options such as chicken or mutton. If not eating beef can help us come closer to our Hindu brothers, what is wrong in it?" he asks.

 

 

Like most MRM members who overtly displayed their affiliation to the RSS, Hussain believes he faces some ostracism. A book entitled 'Environment, Ecology And Natural Resources' which he co-authored with wife Marry Tahir Hussain, as a research associate at Jamia Millia Islamia University, acknowledges the couple's gratitude to 'guruji' Indresh Kumar in the introduction. "I think this is the reason why I never got a permanent job at the university," Hussain says. "My point is that if you have any issues with something which I have done, discuss it with me. Why punish me like this?"

MRM members insist the minority community's suspicions of the RSS are misplaced. During his visit to the RRS camp in Bhopal in the holy month of Ramzan, Hussain was impressed that, every day, one of the pracharaks woke him up before dawn to eat (Sehri) before starting the day's fast. "They also held an iftaar gathering. They are very down-to-earth people. People ask me why RSS? I say why not RSS?" he says.

Imran Chaudhry says everything he had read and heard about the Sangh Parivar's extreme ideology was proved wrong when he met its current head Mohan Bhagwat at the RSS headquarters in Nagpur. "He hugged me. He never put any pressure on me to dress like a pracharak or to convert to Hinduism. And the perception is that these people will do shuddhi of the Muslim community," he says. 

Not surprisingly, the minority community largely continues to believe the RSS is intrinsically an anti-Muslim body and that personal experiences such as Hussain's and Chaudhry's don't matter. "RSS promotes the ideology of a Hindu nation where individual religious choices do not matter. They want everyone to think like a Hindu nationalist. If a Muslim is propagating such an ideology, I would say he is a traitor," says Dr Jamal Ahmed, a physician in the walled city area. 

Being apolitical? 
The MRM's national executive body, comprising of 24 members, is in regular touch with the RSS' Delhi office and holds monthly meetings at a rented flat in Paharganj to chalk out its agenda. It is then conveyed to a working committee of 250 members which ensures its implementation through the cadre.

 

As in its social ideology, there is a strange dichotomy in the MRM's political beliefs. The larger feeling among members, something they stress on, is that this organisation has no political purpose. In an hour-long conversation, Mohammad Afzal, national convener, repeated five times that the role and responsibilities of its members were different from that of the BJP cadre and that while the MRM is a social organisation, the task of the BJP's minority cell involves mobilising minorities for the party.

In the run-up to the 2014 Lok Sabha poll, however, the lines look set to be blurred.

Afzal reveals the message his organisation would convey in the upcoming campaigns: "We have tried every so-called secular party. Why not try the BJP? We should stop treating the BJP as an untouchable party."

Towards this end, the MRM is conceptualising a two-month programme to be implemented on a war footing. Plans include conducting public meetings in more than 100 districts, holding three rallies covering around 20 states, and creating a network of sympathetic clerics at dargahs and seminaries.

Nazim Nizami, the sufi priest of Dargah Nizamuddin, says people from divergent religions and sects are welcome at the dargaah and the fact that the MRM is affiliated to the RSS – a body seen intrinsically to Muslims – cannot be a reason for him to say no to them. (Raj K Raj/HT Photo)



"The Congress government ensured that Muslims do not progress; it did not bother about creating a leadership among the community; but it's always the BJP which is viewed as the enemy," says Afzal. On the Godhra riots, he gives the usual response that, in independent India, more riots have happened in Congress-ruled states than in the ones ruled by the BJP and cites the example of the killing of Sikhs in the 1984 riots in Delhi.

"Congress butchered the Sikhs, but the community did not leave the party. The result is for all of us to see. They remained part of the mainstream and we have a Sikh as the Prime Minister of the country today. Why should we leave the BJP because we have had Godhra?" he wonders.

Interestingly, not all members of the organisation are convinced about disseminating the political message. "If this is going to happen, I will register my opposition," says Mushir Khan, convener, Delhi chapter, MRM, when asked about his organisation's preparations for the 2014 polls.

Nizam Nizami, the chief priest at Dargah Nizamuddin in the capital is averse to discussing anything political. "The dargah is a place of peace," he says when you meet him in his office at the shrine. A hundred pictures of Nizami with political and non-political personalities forms a collage on the wall behind him. Though not an active member of the MRM, he is aware of its activities and believes it is a good initiative to bring the two communities together.

"Here, we get visitors from all sects and communities. Sufism talks about peace and harmony. I don't see anything wrong if an effort like this has been made," he says, referring to the MRM.

 

What about the RSS? 
"All these wrong things that you hear about it, have been propagated by people with a small mentality," he says, as he leaves for evening prayers.

Does the MRM indicate an attitudinal shift among Indian Muslims? "Around 10,000 Muslims joining an organization affiliated to the RSS does not mean much. Even the Shiv Sena in Mumbai has Muslim shaakha pramukhs. If the Congress can use token Muslims, then the RSS can do it too," says sociologist Dipankar Gupta. 

Seema Mustafa, political analyst and author of the book 'Azadi's Daughter- journey of a liberal Muslim', agrees. "We need to take it with a pinch of salt. Even if the MRM has these many members and they approach the minority community with a political message, the BJP is not the party for which the minorities in India will ever vote. It is diametrically opposite to the idea of a secular party," she says.

Whether the objective is to change the psyche of an average Indian Muslim towards the RSS or to sway the Muslim vote in favour of the BJP or both, the Muslim Rashtriya Manch clearly has a long way to go.

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Sunday, September 4, 2016

Islamic atankvad

इस्लामिक आतंकवाद : इतिहास, कारण और निवारण

सुरेश चिपलूणकर

जब रेतीले क्षेत्र में तूफ़ान आते हैं, उस समय शतुरमुर्ग अपना सिर रेत में धँसा लेता है और पृष्ठभाग को तूफ़ान की ओर कर लेता है. ऐसा करके शतुरमुर्ग सोचता है की शायद तूफ़ान टल जाएगा और वह बच जाएगा. इसी प्रकार जब बिल्ली दूध पी रही होती है, उस समय आँखें बंद कर लेती है, तात्कालिक रूप से उसे ऐसा महसूस होता है कि कोई उसे नहीं देख रहा. जबकि ऐसा होता नहीं है. तूफ़ान तो आता ही है और वह शतुरमुर्ग को उड़ा ले जाता है, उसके पंखों के तिनके-तिनके बिखेर देता है, जबकि आँख बंद करके दूध पीती हुई बिल्ली को लाठी पड़ जाती है. समूचे विश्व में पिछले दस-पंद्रह वर्षों से इस्लामिक आतंकवाद ने जिस तेजी से अपने पैर पसारे हैं, उसकी जड़ में गैर-इस्लामिक देशों और समुदायों का यही शतुरमुर्ग वाला रवैया रहा है. फ्रांस पर हुए हालिया "ट्रक बम" हमले के बाद विश्व में पहली बार किसी प्रमुख नेता ने ""इस्लामिक आतंकवाद"" शब्द का उपयोग किया है, वर्ना अमेरिका में जब मोहम्मद अत्ता ने हवाई जहाज लेकर ट्विन टावर गिराए थे, उस समय भी जॉर्ज बुश ने "इस्लामिक" शब्द को छोड़ दिया था, केवल "आतंकवाद" शब्द का उपयोग किया था. अर्थात "आतंकवाद" शब्द से "इस्लामिक आतंकवाद" शब्द तक आते-आते शतुरमुर्गों को इतने वर्ष लग गए. खैर, देर आयद दुरुस्त आयद... फ्रांस के राष्ट्रपति ने "इस्लामिक आतंकवाद" शब्द उपयोग करके संकेत दिया है कि कम से कम यूरोप और पश्चिमी देशों में ही सही, अब यह "बौद्धिक शतुरमुर्ग" अपना सिर रेत से निकालकर तूफ़ान की तरफ देखने और उसके खतरों को सही तरीके से समझने लगा है.
आज चारों ओर "इस्लामिक स्टेट" नामक क्रूर और खूँखार आतंकी संगठन के चर्चे हैं. कुछ वर्ष पहले जब तक ओसामा जीवित था, तब "अल-कायदा" का डंका बजता था... और उससे भी पहले जब अफगानिस्तान में बुद्ध की प्रतिमा को उड़ाया गया था, तब "तालिबान" का नाम चलता था. लेकिन इस्लामिक आतंक के इन विभिन्न नामधारी चेहरों का मूल बीज कहाँ है, इसकी शुरुआत कहाँ से हुई?? अतः इस वैश्विक समस्या को समझने के लिए हमें थोडा और पीछे जाना होगा. पहले हम समस्या के बारे में समझते हैं, फिर इसका निदान क्या हो, इस पर चर्चा होगी...

रणनीतिज्ञ सैयद अता हसनैन लिखते हैं किआजकल किसी भी वैश्विक समस्या को हल करने के लिए नेताओं अथवा कूटनीतिज्ञों या बुद्धिजीवियों के पास इतिहास पढ़ने का समय कम ही होता है, और आम जनता तो बिलकुल हालिया इतिहास तक भूल जाती है, जिस कारण समस्या की गहराई को समझने में सभी गच्चा खा जाते हैं. कट्टर इस्लाम की अवधारणा के बारे में यदि बहस करनी है, अथवा वैश्विक आतंकवाद को समझना है तो सबसे पहले हमें इतिहास में पीछे-पीछे चलते जाना होगा. चौदह सौ वर्ष पीछे न भी जाएँ तो भी सन 1979 को हम एक मील का पत्थर मान सकते हैं. अयातुल्लाह खोमैनी की याद तो सभी पाठकों को होगी?? जी हाँ, इस्लामी आतंक को "वैश्विक" आयाम देने की शुरुआत करने वाले खुमैनी ही थे. आज हम सीरिया, ईराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में जो खूनी खेल देख रहे हैं, इसके मूल में 1979 में घटी तीन प्रमुख घटनाएँ ही हैं. पहली घटना है खुमैनी द्वारा प्रवर्तित "ईरानी क्रान्ति", जिसमें अयातुल्लाह खोमैनी ने ईरान के शाह रजा पहलवी को अपदस्थ करके सत्ता हथिया ली थी. इस दौर में तेहरान में अमेरिकी दूतावास के बावन राजनयिकों को 04 नवंबर 1979 से 20 जनवरी 1981 तक खोमैनी समर्थकों ने बंधक बनाकर रखा था. दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना भी 1979 में ही घटित हुई, जिसमें तत्कालीन सोवियत युनियन ने अफगानिस्तान में तख्तापलट करके अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश की, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिका समर्थित और प्रशिक्षित "मुजाहिदीनों" एवं पाकिस्तान की मदद से लगातार नौ वर्ष तक रूस से युद्ध लड़ा. तीसरी घटना के बारे में अधिक लोग नहीं जानते हैं और ना ही इतिहास में यह अधिक प्रचारित हुई, वह थी सऊदी वहाबी सैनिकों के एक समूह "इख्वान" के एक सदस्य जुहामान-अल-तैयबी ने अपने समर्थकों के साथ मक्का में अल-मस्जिद-अल-हरम पर कब्ज़ा कर लिया. जुहामान ने यह कदम सऊदी राजवंश के कथित गैर-इस्लामी बर्ताव के विरोध में उठाया था, और इस घटना में उसके समर्थकों ने मक्का में आए हुए श्रध्दालुओं को चौदह दिनों तक बंधक बनाकर रखा. अंततः नवंबर 1979 में सऊदी राजवंश द्वारा फ्रांसीसी विशेष सुरक्षा बलों को बुलाया गया, जिन्होंने इस पवित्र मस्जिद में घुसकर इन आतंकियों का खात्मा किया था.

केवल तीस दिनों के अंतराल में घटी इन तीनों घटनाओं ने दुनिया का चेहरा ही बदलकर रख दिया. जैसा कि सभी जानते हैं, ईरान के शाह एक अमेरिकी मोहरे के रूप में काम करने वाले एक तानाशाह भर थे और अयातुल्लाह खोमैनी नामक मौलवी ने इस्लाम के नाम पर ईरान के युवाओं को अमेरिका और पश्चिमी संस्कृति के खिलाफ भड़काकर सत्ता हासिल कर ली. सऊदी राजवंश के लिए हैरानी की बात यह थी इस्लाम के इस कट्टर रूप को उनके वहाबी आंदोलन से नहीं, बल्कि ईरान के शिया आंदोलन ने बढ़ाया. सऊदी अरब जो चतुराई के साथ कट्टर इस्लाम को बढ़ावा देने में लगा हुआ था, उसे यह देखकर झटका लगा कि "शिया" समुदाय उसके खेल में उससे आगे निकला जा रहा है. दूसरी बात यह थी कि काबा की उस पवित्र मस्जिद में "इख्वान" के आतंकियों ने जिस प्रकार नागरिकों और सुरक्षा बलों को दो सप्ताह तक बंधक बनाया और हत्याएँ कीं, और इसके जवाब में सऊदी राजशाही ने फ्रांसीसी सैनिकों को मस्जिद में घुसने की अनुमति दी, उसके कारण सऊदी राजपरिवार पर मस्जिद को अपवित्र करने के गंभीर आरोप लगने लगे थे. यानी उधर ईरान में शियाओं के नेता खुमैनी द्वारा कट्टरता को बढ़ावा देने और इधर सऊदी में मस्जिद को अपवित्र करने के आरोपों के चलते सऊदी अरब के राजपरिवार और इस्लामी मौलवियों ने अपने "वहाबी कट्टरता" को और तीखा स्वरूप देने का फैसला कर लिया. यही वह मोड़ था जहाँ से पेट्रो-डॉलर के बूते दुनिया में "इस्लामिक वहाबी" को क्रूर, तीखा और सर्वव्यापी बनाने की योजनाएँ शुरू हुईं.

"कट्टर वहाबियत" को और हवा मिली अफगानिस्तान की घटनाओं से. रूस ने अफगानिस्तान के काबुल में अतिक्रमण करते हुए अपने कठपुतली बबरक करमाल की सरकार बनवा दी और जमकर शक्ति प्रदर्शन किया. इस कारण अफगानिस्तान से लगभग पचास लाख मुस्लिम शरणार्थी पड़ोसी पाकिस्तान और ईरान में भाग निकले. इस क्षेत्र में कच्चे तेल की प्रचुर मात्रा को देखते हुए सऊदी अरब में अड्डा जमाए बैठे अमेरिका को अपनी बादशाहत पर खतरा महसूस होने लगा और वह भी तालिबानों को प्रशिक्षण देकर रूस को कमज़ोर करने के इस हिंसक खेल में एक खिलाड़ी बन गया. "तेल के इस निराले खेल" के बारे में हम बाद में देखेंगे, पहले हम वहाबियत और सुन्नी आतंक के प्रसार पर आगे बढ़ते हैं. अफगानिस्तान में हुए इस घटनाक्रम ने सऊदी राजशाही को वहाबी विचारधारा फैलाने में खासी मदद की. उसने अमेरिका की मदद से पाकिस्तान की अफगान सीमा पर हजारों शरणार्थी कैम्प बनाए और उन कैम्पों को "तालिबान" का मानसिक प्रशिक्षण केन्द्र बना डाला. सऊदी ब्राण्ड मौलवियों ने इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में लाखों लोगों का जमकर "ब्रेनवॉश" किया, जो कि सऊदी राजशाही को पसंद आया, क्योंकि ऐसा करने से उसकी "कट्टर इस्लामी" छवि बरकरार रही और मुसलमान काबा की मस्जिद का अपवित्रीकरण वाला मामला भूल गए. इस खेल में सऊदी अरब को केवल पैसा लगाना था, बाकी का काम वहाबी काम मुल्ला-मौलवियों को और सैनिक कार्य अमेरिका को करना था. सोवियत संघ के अफगानिस्तान से चले जाने के बाद भी यह खेल जारी रहा और अन्य इस्लामिक देशों में पहुँचा. कहने का तात्पर्य यह है कि 1979 में घटित होने वाली इन्हीं प्रमुख घटनाओं ने मध्य एशिया में वहाबी विचारधारा का प्रचार-प्रसार किया और साथ ही मुसाब-अल-ज़रकावी (ISIS का जनक), ओसामा बिन लादेन और आयमान-अल-जवाहिरी जैसे कुख्यात आतंकियों को फलने-फूलने का मौका दिया. इन लोगों ने सऊदी पैसों का जमकर उपयोग करते हुए न सिर्फ अपना जलवा कायम किया, बल्कि "वहाबी इस्लाम की कट्टर विचारधारा को विश्वव्यापी बनाया, जिसका जहरीला व्यापक रूप हम इक्कीसवीं शताब्दी में देख रहे हैं.

आतंक के इस वहाबी खेल में एक और खिलाड़ी सारे घटनाक्रम को चुपचाप देख रहा था और इसमें उसका और उसके देश का फायदा कैसे हो यह सोच रहा था... वह "खिलाड़ी"(?) था पाकिस्तान का जनरल जिया-उल-हक. विश्व में घट रहे इस घटनाक्रम ने जनरल ज़िया को यह मौका दिया कि वह खुद को जिन्ना के बाद पाकिस्तान के सबसे वफादार इस्लामिक रहनुमा के रूप में खुद को पेश कर सके. 1977 में जुल्फिकार अली भुट्टो को अपदस्थ करके सैनिक विद्रोह से तानाशाह बने जनरल जिया-उल-हक ने 1979 में भुट्टो को सूली पर लटका दिया था. जिया-उल-हक यह बात अच्छी तरह से समझ चुका था कि भारत से सीधे युद्ध में नहीं जीता जा सकता, क्योंकि पिछले दोनों युद्ध जिया ने करीब से देखे थे. भारत को नुक्सान पहुँचाने के लिए जनरल जिया ने "Thousand Cuts" नामक नई रणनीति बनाई, जिसमें भारत के अंदर ही अंदर विवादित मुद्दों को हवा देना, आतंकियों से हमले करवाना, सेना और नागरिकों पर छोटे-छोटे हमले करवाना प्रमुख था (जनरल ज़िया की यह रणनीति पाकिस्तान और उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI आज भी जारी रखे हुए है). जनरल ज़िया ने समय रहते ताड़ लिया था कि अमेरिका-रूस-सऊदी अरब के इस "युद्ध त्रिकोण" में यदि अधिकतम फायदा उठाना है तो "वहाबी विचारधारा" को बढ़ावा देते हुए सऊदी अरब और अमेरिका से पैसा झटकते रहना है. जनरल ज़िया जानता था कि यदि सुरक्षित रहना है और अनंतकाल तक विश्व को ब्लैकमेल करना हो तो "परमाणु ताकत" बनना जरूरी है, और इस काम के लिए बहुत सा धन चाहिए, जो केवल सऊदी अरब और जेहाद के नाम पर ही हासिल किया जा सकता है. उसने ठीक ऐसा ही किया, एक तरफ लगातार भारत के खिलाफ छद्म युद्ध जारी रखा और दूसरी तरफ सऊदी अरब को खुश करने के लिए उनका प्रिय बना रहा. सऊदी अरब का अकूत धन, वहाबी विचारधारा और परमाणु ताकत बनने के लिए सारे इस्लामिक जगत का राजनैतिक समर्थन, ज़िया-उल-हक को और क्या चाहिए था. बड़ी चतुराई से जनरल ज़िया ने पाकिस्तान को वहाबी आतंक की मुख्य धुरी बना लिया. और चीन एवं उत्तर कोरिया की मदद से परमाणु ताकत हासिल करके अमेरिका को ब्लैकमेल करने की स्थिति में ला दिया. ज़िया-उल-हक ने सऊदी राजपरिवार और प्रशासन की सुरक्षा हेतु 1989 में पाकिस्तान से एक पूरी ब्रिगेड बनाकर दी. इसके अलावा उसने अफगान सीमा पर स्थित शरणार्थी कैम्प में मदरसों की खासी संख्या खड़ी कर दी, जहाँ कट्टर मौलवियों ने सोवियत संघ के खिलाफ मुजाहिदीन तालिबानों को तैयार कर दिया. इन्हीं मुजाहिदीनों ने इस्लाम के नाम पर लगातार अपना युद्ध जारी रखा और अंततः नब्बे के दशक में अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्ज़ा कर ही लिया. इसके बाद तालिबान कश्मीर, बोस्निया, चेचन्या सहित बाकी विश्व में फैलना शुरू हो गए. अस्सी के दशक के अंत तक वहाबी विचारधारा और आतंक को मजबूत करने का यह खेल लगातार जारी रहा, क्योंकि वहाबियों को किसी भी कीमत पर ईरान के "शियाओं" के साथ शक्ति संतुलन में अपना वर्चस्व बनाए रखना था. इसीलिए जब से ईरान ने भी अपनी परमाणु शक्ति बढ़ाने का खुल्लमखुल्ला ऐलान कर दिया तो वहाबी पाकिस्तान अपने इस्लामिक परमाणु एकाधिकार को लेकर चिंतित हो गया. शिया ईरान को रोकने के लिए वहाबी विचारक अमेरिका की चमचागिरी से लेकर अन्य किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थे. अमेरिका ने इन दोनों का बड़े ही शातिराना ढंग से उपयोग किया और अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने तथा उपभोगवादी जनता के लिए इन देशों से जमकर तेल चूसा.

अमेरिका के इस खेल को सबसे पहली चुनौती मिली इराक के सद्दाम हुसैन से. सद्दाम हुसैन ने अमेरिका का खेल समझ लिया था और उसने सोचा कि क्यों न वह खुद ही इस खेल को खेले और ईराक को ईरान के मुकाबले मजबूत बना ले. इसी मुगालते में सद्दाम ने कुवैत पर हमला कर दिया और दर्जनों हत्याओं के साथ कुवैत के सैकड़ों तेल कुंए जला डाले. लेकिन सद्दाम का यह दुस्साहस उसे भारी पड़ा. अमेरिका से सीधी दुश्मनी और तेल पर कब्जे की लड़ाई में खुद तनकर खड़े होने अमेरिका को रास नहीं आया और उसने सद्दाम को ठिकाने लगाने के लिए नए जाल बुनने शुरू कर दिए. कहने का तात्पर्य यह है कि इस्लामी अर्थात वहाबी विचारधारा से पोषित आतंकवाद को समझने के लिए इस इतिहास को खंगालना बेहद जरूरी है. खुमैनी, सऊदी अरब और ज़िया-उल-हक की तिकड़ी तथा अमेरिका-रूस के बीच वैश्विक वर्चस्व की इस लड़ाई ने आतंकवाद को पोसने में बड़ी भूमिका निभाई... आज फ्रांस, फ्लोरिडा, बेल्जियम, ढाका आदि में जो लगातार हमले हम देख रहे हैं, वह इसी ऐतिहासिक "रक्तबीज" के अंश ही हैं.

किसी समस्या को जड़-मूल से ख़त्म करने के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सक सबसे पहले उस बीमारी का इतिहास जानते हैं, फिर कारण जानते हैं और उसी के अनुसार निवारण भी करते हैं. अभी जो हमने देखा वह इस्लामिक आतंकवाद की जड़ को, उसके इतिहास को समझने का प्रयास था. अब हम आते हैं कारण की ओर. आतंकवाद वर्तमान समय में इस विश्व की सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरा है, ऐसी समस्या जो कम होने की बजाय लगातार बढती ही जा रही है. यह समस्या ऐसा गंभीर रोग बन गयी है जिसका आज तक समाधान नहीं निकल पाया है. इस्लामिक आतंकवाद की इस समस्या को समझने के लिए सबसे पहले तो विश्व के तमाम नेताओं, लेखकों, बुद्धिजीवियों को यह समझना और मान्य करना होगा कि इसका सीधा सम्बन्ध मज़हबी व्याख्याओं से है. इस्लामिक आतंकवाद से लड़ने के लिए सैनिक, गोला-बारूद और टैंक कतई पर्याप्त नहीं हैं. जब तक हम शार्ली हेब्दो के कार्टून पर फ्रांस में मचाए गए कत्लेआम, अथवा डेनमार्क के कार्टूनिस्ट की हत्या अथवा सलमान रश्दी के खिलाफ फतवे अथवा यजीदी महिलाओं के साथ बलात्कार और उन्हें गुलामों की तरह खरीदे-बेचे जाने के पीछे की मानसिकता को नहीं समझते, और स्वीकार करते तब तक सभी लोग केवल अँधेरे में तीर चला रहे होंगे और अनंतकाल तक चलने वाले इस युद्ध में खुद को झोंके रखेंगे. जिस तरह फ्रांस के राष्ट्रपति अथवा अमेरिका के राष्ट्रपति उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने खुलेआम कहा, उसी तरह स्वीकार कीजिए कि इस्लाम की शिक्षाओं एवं कुरआन की व्याख्याओं के गलत-सलत अनुवादों एवं मुल्ला-मौलवियों द्वारा मनमाने तरीके से हदीस और शरीयत को लागू करने के कारण ही यह समस्या नासूर बनी है. यह एक तरह से मलेरिया के खिलाफ युद्ध है. केवल मच्छर मारने अथवा कुनैन की गोली खिलाने से मरीज की बात नहीं बनेगी, बल्कि जिस गंदे पानी में मलेरिया के लार्वा पनप रहे हैं, जहां से प्रेरणा ले रहे हैं, उस पानी में दवा का छिड़काव जरूरी है. अर्थात मूल समस्या यह है की इस्लामिक धर्मगुरुओं द्वारा मनमाने तरीके से कुरआन-हदीस की व्याख्या की गई है, सबसे पहले बौद्धिक रूप से युद्ध करके उसे दुरुस्त करना पड़ेगा. भारत के इस्लामिक बुद्धिजीवी मौलाना वहीदुद्दीन खान ने समस्या की जड़ को बिलकुल सही पकड़ा है. वहीदुद्दीन लिखते हैं कि चूंकि विभिन्न देशों में कार्यरत मौलवियों, उलेमाओं और काज़ियों की उनके इलाके की जनता पर खासी पकड़ होती है, इसलिए वे चाहते हैं कि उनका यह वर्चस्व बना रहे, इसलिएतात्कालिक परिस्थितियों के मुताबिक़ वे कुरआन-हदीस और शरीयत के मनमाने मतलब निकालकर मुस्लिम समुदाय को दबाए रखते हैं. कुछ मौलवी तो इस हद तक चले जाते हैं, कि उनके अलावा कोई दूसरा मुसलमान कुरआन की व्याख्या कर ही नहीं सकता.
मौलाना वहीदुद्दीन खान के अनुसार कुरआन के नाज़िल होने के पश्चात कई वर्षों तक इस्लामिक समाज के नियमों एवं मान्यताओं पर कई विद्वानों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार उसकी व्याख्या की जिसे तत्कालीन शासकों का समर्थन भी मिलता रहा, और धीरे-धीरे यह मान लिया गया कि यह सब कुरआन में ही है और मौलवी कह रहे हैं तो सही ही होगा. एक और इस्लामिक विद्वान तारेक फतह कहते हैं कि पैगम्बर मोहम्मद द्वारा पूरी कुरआन लगभग तेईस वर्ष में नाज़िल की गई. ईस्वी सन 632 में पैगम्बर मोहम्मद की मृत्यु के पश्चात ही विवाद शुरू हो गए थे. अपनी पुस्तक में तारिक लिखते हैं की पैगम्बर मोहम्मद की जीवनी जिसे सूरा कहते हैं, लगभग सौ वर्ष बाद लिखी गई, इसी प्रकार हदीस को भी लगभग दो सौ से चार सौ वर्षों के बीच लगातार लिखा जाता रहा. जबकि शरीयत क़ानून पैगम्बर की मौत के चार सौ से छः सौ वर्ष बाद तक लिखे जाते रहे, उसमें बदलाव होते रहे, उसकी मनमानी व्याख्याएँ की जाती रहीं. इस्लाम की सबसे कट्टर व्याख्याएँ अब्दुल वहाब (1703-1792) द्वारा की गईं. सन 1803 से 1813 तक मक्का पर सऊदी नियंत्रण था, उसके बाद ओटोमान ने इसे वापस हासिल किया. हालांकि अंत में 1925 में यह पुनः सऊदी कब्जे में आया और सऊदी साम्राज्य ने मक्का-मदीना की लगभग 90% इमारतें गिरा दीं, यहाँ तक की जिसमें खुद पैगम्बर मोहम्मद रहते थे उस इमारत को भी नहीं छोड़ा. अब ये कट्टर वहाबी रूप इस कदर फ़ैल गया है की ISIS ने भी विभिन्न मज़ारों और इस्लाम की ऐतिहासिक धरोहरों को ही नष्ट करना शुरू कर दिया है. ऐसे में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस्लाम की धार्मिक व्याख्याओं में कितना घालमेल है, और इसी वजह से भारत में जाकिर नाईक, पाकिस्तान में अल-जवाहिरी अथवा ब्रिटेन में अंजेम चौधरी जैसे तथाकथित इस्लामिक विद्वान बड़ी आसानी से युवाओं को बरगला लेते हैं.इस्लाम के संस्थापक पैगम्बर मोहम्मद निश्चित रूप से एक चतुर और बुद्धिमान व्यक्ति थे, उन्होंने अपनी प्रत्येक रणनीति को सीधे "अल्लाह" से जोड़ दिया और अपने प्रत्येक विरोधी को काफ़िर घोषित कर दिया. तत्कालीन परिस्थितियों में उनकी वह रणनीति कामयाब भी रही, लेकिन उनकी मृत्यु के पश्चात इसी विचार को आगे बढाते हुए ढेरों मौलवियों ने सैकड़ों वर्ष तक कुरआन की मनमानी व्याख्या की. ऐसे में इस विचारधारा का मुकाबला केवल गोलियों-बम-बन्दूकों से संभव नहीं है, इसे तो बौद्धिक स्तर पर लड़ना होगा. वहाबी इस्लाम तो शियाओं के साथ सहा-अस्तित्त्व को भी राजी नहीं है. वहाबी मूवमेंट में निशाने पर सबसे पहले शिया ही रहे हैं, जिनका अस्तित्व खत्म करने के लिए सऊदी अरब पोषित इस्लाम ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. अतः कोई यह कैसे कह सकता है कि, आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता? परन्तु आतंकी तो मौलवियों द्वारा इस्लाम की गलत व्याख्या के कारण इसे अल्लाह और कुरान का आदेश मानते हैं. मुस्लिम समुदाय के अन्दर से आवाज़ उठनी चाहिए कि वे ऐसे आरोपों से बचना चाहते हैं. ये लोग खुलकर आतंकवाद के खिलाफ आगे आएँ और कहें कि आतंकवादी अपने साथ इस्लाम शब्द को जोड़ना बंद करें. अपने कुकर्मों को अल्लाह या कुरान का आदेश बताना बंद करें. तमाम आतंकी संगठनों के नाम में इस्लाम के पवित्र शब्दों को रखना बंद करें. क्योंकि जब तक मुस्लिम समुदाय खुद को नहीं बदलता, और अपनी मजहबी संकीर्ण सोच खत्म करके आतंकियों, मुल्ला-मौलवियों के खिलाफ उठ खड़ा नहीं होता, तब तक उसे ऐसे आरोप झेलने ही पड़ेंगे. ज़ाहिर है कि यह काम इस्लाम के भीतर से ही होगा, बाहर से कोई गैर-इस्लामी व्यक्ति इस बहस में घुसेगा तो न सिर्फ मुंह की खाएगा, बल्कि उसकी मंशा पर भी शक किया जाएगा. इसलिए तारिक फतह, तसलीमा नसरीन, सलमान रश्दी, मौलाना वहीदुद्दीन खान, जूडी जेसर, अली सिना, इमरान फिरासत जैसे लोगों को आगे आना होगा, विमर्श आरम्भ करने होंगे, विभिन्न देशों में स्थित मुसलमानों को इस्लाम की सही व्याख्या करके दिखानी होगी, सेमिनार-पुस्तकें इत्यादि आयोजित करने होंगे. लेकिन साथ ही साथ आतंकियों के सामने घुटने नहीं टेकने की ठोस नीति बनानी होगी. इसीलिए विभिन्न सरकारों, गुप्तचर सेवाओं को साथ लेना होगा, तथा विशेषकर पाकिस्तान (जो इस आतंक का वैचारिक पोषक है) पर नकेल कसनी होगी.

ये तो हुआ पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण कदम यानी कट्टर इस्लाम का उदार इस्लाम से बौद्धिक युद्ध. इसी के साथ जुडी हुई वैचारिक भ्रान्तियों को भी दूर करने की जरूरत है. यह वैचारिक भ्रान्तियाँ वामपंथियों तथा सेकुलर बुद्धिजीवियों ने फैला रखी हैं. जिसमें से सबसे पहली भ्रान्ति है कि – "ये आतंकी गरीब और अनपढ़ हैं, इसलिए मौलवियों के जाल में फँस जाते हैं". यह सबसे बड़ा झूठ है जो चरणबद्ध तरीके से फैलाया गया है, क्योंकि खुद ओसामा बिन लादेन अरबपति था, अच्छा-ख़ासा पढ़ा लिखा था. ट्विन टावर से हवाई जहाज भिड़ाने वाला मोहम्मद अत्ता पायलट था, बंगलौर से ISIS का ट्विटर हैंडल चलाने वाला प्रमुख स्लीपर सेल सॉफ्टवेयर इंजीनियर है. यानी कि पेट्रो-डॉलर में अरबों रूपए कमाने वाले देशों द्वारा बाकायदा जिन मुस्लिम लड़कों का ब्रेनवॉश किया जाता है, उनमें से अधिकाँश पढ़े-लिखे इंजीनियर, डॉक्टर, सॉफ्टवेयर कर्मी तथा मैनेजमेंट स्तर की पढ़ाई कर चुके लोग हैं. ज़ाहिर है कि शिक्षा की कमी वाला तर्क एकदम बेकार है... इसी प्रकार यह कहना भी एकदम बकवास है कि मुस्लिम आतंक के पीछे शोषण या गरीबी है. जब "तथाकथित" बुद्धिजीवी यह बहानेबाजी बन्द कर देंगे कि इस्लामिक आतंक की समस्या शोषण, गरीबी, अथवा अशिक्षा है, तभी इस समस्या का हल निकाला जा सकता है, क्योंकि यह सिद्ध हो चुका है कि यह समस्या केवल और केवल मौलवियों तथा निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा कुरआन-हदीस-शरीयत की गलत व्याख्या और जेहाद तथा बहत्तर हूरों जैसी कहानियाँ सुनाकर मज़हबी वैचारिक ज़हर फैलाने के कारण है. इसका मुकाबला करने के लिए वैचारिक पाखण्ड छोड़ना पड़ेगा, और मिलकर काम करना होगा. जहाँ-जहाँ सैनिक शक्ति जरूरी है, वह तो सरकारें कर ही रही हैं, परन्तु बौद्धिक युद्ध ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. इस्लामी जगत में बच्चों को वैचारिक रूप से जागरूक बनाना होगा, उनके सामने इस्लाम की सही तस्वीर पेश करनी होगी और जवाहिरी-लादेन-ज़ाकिर-अंजुम जैसे इस्लाम को विकृत करने वाले प्रचारकों पर लगाम कसनी होगी.

इस्लामिक आतंकवाद की समस्या का एक और महत्त्वपूर्ण पहलू है, जो कि अर्थव्यवस्था और धन से जुड़ा हुआ है और इस पहलू पर भी केवल इस्लामिक देशों द्वारा ही काबू पाया जा सकता है. यह पहलू है कच्चे तेल से जुडी राजनीति का. विश्व की महाशक्तियाँ इस्लामी देशों से निकलने वाले तेल पर शुरू से निगाह बनाए हुए हैं. कच्चे तेल के बैरलों की भूख ने दुनिया में लाखों मासूमों का खून बहाया है. उल्लेखनीय है कि अमेरिका ने सऊदी अरब के राजपरिवार पर लगभग कब्ज़ा किया हुआ है. अमेरिका ने सऊदी अरब में अपना स्थायी अड्डा जमा रखा है.सभी जानते हैं कि अमेरिका महा-उपभोगवादी देश है और पेट्रोल का प्यासा है. सबसे पहले अमेरिका ने ही "तेल का खेल" शुरू किया और सऊदी अरब को अपने जाल में फँसाया. सद्दाम हुसैन पर नकली आरोप मढ़कर ईराक को बर्बाद करने और वहाँ के तेल कुओं से कच्चा तेल हथियाने का खेल भी अमेरिका ने ही खेला. अमेरिका की देखादेखी रूस भी इस खेल में कूदा और दस साल तक अफगानिस्तान में जमा रहा. चाहे नाईजीरिया हो, अथवा वेनेजुएला हो.. जिस-जिस देश में अकूत तेल की सम्पदा है, वहाँ-वहाँ अमेरिका की टेढ़ी निगाह जरूर पड़ती है. हाल ही में तुर्की में हुए जी20 शिखर सम्मेलन के मौके पर दुनिया के सभी देशों ने पेरिस में हुए आंतकी हमले की भरसक निंदा की. परन्तु सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने हैरतअंगेज खुलासा किया कि दुनिया के चालीस से अधिक देश आंतकवाद को फाइनेंस कर रहे हैं, और इसमें से कई देश जी20 समूह में शामिल हैं.

पुतिन ने इन देशों के नाम तो नहीं लिया लेकिन यह जरूर साफ किया कि इनमें से कुछ ऐसे देश हैं, जो दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हैं. चूँकि जी20 समूह दुनिया की बीस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का समूह है. इनमें अमेरिका, चीन, फ्रांस, सउदी अरब, ब्राजील और भारत या खुद रूस भी हो सकता है. पिछले एक साल में जिस तरह से इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने काला झंडा उठा रखा है और सीरिया तथा ईराक के तेल के भंडारों पर कब्जा किया है, उससे साफ है कि यह आतंकवाद का नया दौर है, जहां एक इस्लामिक कट्टर संगठन एक स्वयंभू "राज्य" बनने की कोशिश कर रहा है. पश्चिमी मीडिया और कच्चे तेल के कारोबार से जुड़े संगठन दावा कर चुके हैं, कि ISIS अपने कब्जे वाले तेल के भंडारों से तेल निकाल कर बहुत कम दामों पर बेच रहा है. जिस कारण तेल की कीमतों के अन्तर्राष्ट्रीय भावों में अस्थिरता बनी हुई है और कई देश इस उतार-चढ़ाव की चपेट में हैं. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में पिछले एक साल से कच्चा तेल 110 डॉलर के स्तर से गिरकर 40 डॉलर के आसपास बिक रहा है. उधर ओपेक देशों (जिनमें सभी इस्लामिक देश हैं) की आपसी खींचतान में ईराक सरकार के तेल भंडारों से जमकर तेल निकाला जा रहा है. तेल के बाजार में अपनी उपस्थिति बनाए रखने के लिए ईराक सरकार को 30 डॉलर प्रति बैरल की दर पर कच्चा तेल बेचना पड़ रहा है. जबकि उधर ISIS अपने कब्जे वाले भंडारों से तेल निकाल कर अंतरराष्ट्रीय बाजार में 20 डॉलर प्रति बैरल की दर से बेच रहा है. रूसी राष्ट्रपति पुतिन के अनुसार रूस ने अपने सैटेलाइट के द्वारा देखा है कि ISIS के कब्जे वाले इलाकों में हजारों की संख्या में कच्चा तेल लेने के लिए टैंकरों के भीड़ लगी हुई है.

अब यहाँ सवाल उठता है कि जब ISIS बीस डॉलर की दर से तेल बेच रहा है और करोड़ों रूपए कमा रहा है तो यह पैसा कहाँ जा रहा है? ज़ाहिर है कि हथियार और अन्य सैन्य उपकरण खरीदने में. विश्व में हथियारों का सबसे बड़ा विक्रेता कौन है, अमेरिका.अर्थात घूम-फिरकर पैसा पुनः अमेरिका के पास ही पहुँच रहा है. तमाम इस्लामिक आतंकी संगठन दावा करते हैं कि अमेरिका और इजरायल उनके दुश्मन नंबर वन हैं, लेकिन वास्तव में देखा जाए तो "कच्चे तेल के इस आर्थिक गेम" में सबसे बड़ा खिलाड़ी, अम्पायर और विपक्ष खुद अमेरिका ही है. इस्लामिक देशों के शासक या तो बेवकूफ हैं, या लालची हैं. अमेरिका ने सऊदी अरब में अपनी मनमर्जी चला रखी है, इसी तरह "ओपेक" देशों में से कई देशों में उसकी कठपुतली सरकारें काम कर रही हैं. परन्तु गलती अकेले अमेरिका की ही क्यों मानी जाए? मुस्लिम बुद्धिजीवी और इस्लामिक जगत के प्रभावशाली लोग इन इस्लामी शासकों को यह बात क्यों नहीं समझाते कि जब तक पश्चिमी देशों का दखल इस इलाके में बना रहेगा, तब तक आपस में युद्ध भी चलते रहेंगे, मारकाट और आतंक भी पाला-पोसा जाता रहेगा. हमेशा से अमेरिका के दोनों हाथों में लड्डू रहते हैं. ईरान-ईराक के दस वर्ष लंबे युद्ध में दोनों देशों को हथियार बेचकर सबसे अधिक कमाई अमेरिका ने ही की. जब युद्ध समाप्त हो गया, तब भी विभिन्न बहाने बनाकर वह क्षेत्र में पैर जमाए बैठा रहा. रूस और चीन, अमेरिका का यह खेल समझते हैं परन्तु खुलकर उससे दुश्मनी लेने से बचते रहे हैं. यदि अमेरिका और पश्चिमी देश चाहें तो कभी भी ISIS का खात्मा कर सकते हैं, लेकिन फिर बीस डॉलर के भाव से मिलने वाला कच्चा तेल भी मिलना बन्द हो जाएगा और हथियारों की बिक्री भी बन्द हो जाएगी.

अंत में संक्षेप में इतना ही कहना है कि "इस्लामिक आतंकवाद" की समस्या केवल जलेबी ही नहीं बल्कि इमरती और नूडल्स की तरह टेढ़ी-मेढ़ी और उलझी हुई है. इसमें कई पक्ष आपस में एक-दूसरे से टकरा रहे हैं. फिर भी जैसा कि लेख में सुझाया गया है, यदि इस्लामिक विद्वान और बुद्धिजीवी कुरआन-हदीस की सही और सटीक व्याख्याएँ करके आने वाली पीढ़ी को जेहादी मानसिकता से दूर ले जाने में सफल हों तथा इस्लामिक देश अपने यहाँ अमेरिका व पश्चिमी देशों का दखल बन्द करके अपने लालच (और मूर्खता) में कमी लाएँ, तो काफी हद तक इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है. ज़ाहिर है कि ये उपाय अपनाना इतना सरल भी नहीं है, तो लड़ाई लंबी है. कल फ्रांस था, आज इस्ताम्बुल है, तो कल बाली या परसों कोलकाता भी हो सकता है और मानवता के पैरोकार व शांति की चाहत रखने वाले सामान्य मनुष्य के लिए फिलहाल तो कोई राहत नहीं है...

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Thursday, July 14, 2016

Hinduism

Hinduism is open source



We first had the wisdom of the Vedas. Then came the Vedanta period (end of the Vedas) and people relied on the Upanishads. Finally the Ramayan and Mahabharat became the most popular books of Hinduism. They had their own philosophies which steadily took forward the narrative as the centuries went by.

Animal slaughter existed in ancient Vedic times, but we adopted peaceful temple worship and vegetarianism, further endorsed by Buddhism and Jainism. Hinduism is not a static religion but the most dynamic religion in the world. After the success of the open course software movement, a lot of people realized that Hinduism too was open course.

Whether it's software or religion: The future is open source.

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4. Hinduism is a huge believer in woman power





Gods and goddesses rule India in equal measure. If Ganesh Puja is the life of Mumbai, Kali Puja is the highlight of Kolkata. The river Ganga symbolizes the goddess and Vaishno Devi is a top pilgrimage centre in North India. Shakti is woman empowerment. Shakti is the power of the feminine divine which can be tapped by both men and women.



Says the Shaktisangama Tantra...



Woman is the creator of the universe,

The universe is her form,

Woman is the foundation of the world,

She is the true form of the body.



Very few traditions in the world talk of the feminine in such a fashion. In Hinduism, at the divine and cosmic level, there is nothing to distinguish the masculine and the feminine

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Tuesday, June 21, 2016