Thursday, August 7, 2014

Raxabandhan

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> रक्षा बंधन के पर्व का महत्व भारतीय जनमानस में प्राचीन काल से गहरा बना
> हुआ है. यह बात सच है कि पुरातन भारतीय परंपरा के अनुसार समाज का शिक्षक
> वर्ग होता था, वह रक्षा सूत्र के सहारे इस देश की ज्ञान परंपरा की रक्षा
> का संकल्प शेष समाज से कराता था. सांस्कृतिक और धार्मिक पुरोहित वर्ग भी
> रक्षा सूत्र के माध्यम से समाज से रक्षा का संकल्प कराता था. हम यही पाते
> हैं कि किसी भी अनुष्ठान के बाद रक्षा सूत्र के माध्यम से उपस्थित सभी
> जनों को रक्षा का संकल्प कराया जाता है. राजव्यवस्था के अन्दर राजपुरोहित
> राजा को रक्षा सूत्र बाँध कर धर्म और सत्य की रक्षा के साथ साथ संपूर्ण
> प्रजा की रक्षा का संकल्प कराता था. कुल मिलाकर भाव यही है कि शक्ति
> सम्पन्न वर्ग अपनी शक्ति सामर्थ्य को ध्यान में रखकर समाज के श्रेष्ठ
> मूल्यों का एवं समाज की रक्षा का संकल्प लेता है. संघ के संस्थापक परम
> पूज्य डॉक्टर साहब हिन्दू समाज में सामरस्य स्थापित करना चाहते थे तो
> स्वाभाविकरूप से उनको इस पर्व का महत्व भी स्मरण में आया और समस्त हिन्दू
> समाज मिलकर समस्त हिन्दू समाज की रक्षा का संकल्प ले, इस सुन्दर स्वरूप
> के साथ यह कार्यक्रम (उत्सव) संघ में स्थापित हो गया.
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> Raksha Bandhanवैसे तो हिन्दू समाज के परिवारों में बहिनों द्वारा भाइयों
> को रक्षा सूत्र बांधना, यह इस पर्व का स्थायी स्वरूप था. संघ के उत्सवों
> के कारण इसका अर्थ विस्तार हुआ. सीमित अर्थों में न होकर व्यापक अर्थों
> में समाज का प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक वर्ग की रक्षा का संकल्प लेने लगा.
> समाज का एक भी अंग अपने आपको अलग-थलग या असुरक्षित अनुभव न करने पाये –
> यह भाव जाग्रत करना संघ का उद्देश्य है.
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> महाविकट लंबे पराधीनता काल के दौरान समाज का प्रत्येक वर्ग ही संकट में
> था. सभी को अपने अस्तित्व की सुरक्षा एवं प्राण रक्षा की चिंता थी. इस
> कारण समज के छोटे-छोटे वर्गों ने अपने चारों ओर बड़ी दीवारें बना लीं.
> समाज का प्रत्येक वर्ग अपने को अलग रखने में ही सुरक्षा का अनुभव कर रहा
> था. इसका लाभ तो हुआ, किंतु भिन्न-भिन्न वर्गों में दूरियां बढ़तीं गईं.
> हिन्दू समाज में ही किन्हीं भी कारणों से आया दूरी का भाव बढ़ता चला गया.
> कहीं-कहीं लोग एक दूसरे को स्पर्श करने से भी भयभीत थे. कुछ लोग, कुछ
> लोगों की परछाईं से भी डरने लगे. जातियों के भेद गहरे हो गये. भाषा और
> प्रांत की विविधताओं में कहीं-कहीं सामञ्जस्य के स्थान पर विद्वेष का रूप
> प्रकट होने लगा. यह विखण्डन का काल था. ऐसा लगता था कि हिन्दू समाज
> अनगिनत टुकड़ों में बंट जायेगा. सामञ्जस्य एवं समरसता के सूत्र और कम
> होते गये. विदेशी शक्तियों ने बजाय इसके कि इसको कम किया जाये, आग में घी
> डालने का काम किया. विरोधों का सहारा लेकर खाई को चौड़ा किया. विविधता
> में विद्वेष पैदा करने में वे लोग सिद्धहस्त थे.
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> राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हिन्दू समाज की इस दुर्दशा का दृश्य देखा तो
> न केवल इसकी पीड़ा का अनुभव किया वरन् इसके स्थायी निवारण का संकल्प
> लिया. रक्षा बंधन के पर्व को सनातन काल से सामरस्य का पर्व माना गया है.
> यह आपसी विश्वास का पर्व है. इस पर्व पर जो-जो सक्षम थे, वे अन्य को
> विश्वास दिलाते थे कि वे निर्भय रहें. किसी भी संकट में सक्षम उनके साथ
> खड़े रहेंगे. संघ ने इसी विश्वास को हजारों स्वयंसेवकों के माध्यम से
> समाज में पुनर्स्थापित करने का श्रेयस्कर कार्य किया. रक्षा बंधन के पर्व
> पर स्वयंसेवक परम पवित्र भगवा ध्वज को रक्षा सूत्र बांधकर उस संकल्प का
> स्मरण करते हैं, जिसमें कहा गया है कि धर्मो रक्षति रक्षित: अर्थात् हम
> सब मिलकर धर्म की रक्षा करें. समाज में मूल्यों का रक्षण करें. अपनी
> श्रेष्ठ परंपराओं का रक्षण करें. यही धर्म का व्यावहारिक पक्ष है. तभी तो
> धर्म सम्पूर्ण समाज की रक्षा करने में सक्षम हो सकेगा. धर्म बाहरी तत्व
> नहीं है. हम सबमें छिपी या मुखर उदात्त भावनाओं का नाम है. हमारा जो
> व्यवहार लोकमंगलकारी है, वही धर्म है. ध्वज को रक्षा सूत्र बांधने का
> हेतु भी यही है कि समाज के लिये हितकर उदात्त परंपरा का रक्षण करेंगे.
> स्वयंसेवक भी एकदूसरे को स्नेह-सूत्र बांधते हैं. जाति, धर्म, भाषा,
> धनसंपत्ति, शिक्षा या सामाजिक ऊंचनीच का भेद अर्थहीन है. रक्षाबंधन का
> सूत्र इन सारी विविधताओं और भेदों के ऊपर एक अभेद की सृष्टि करता है. इन
> विविधताओं के बावजूद एक सामरस्य का स्थापन करता है. इस नन्हें से सूत्र
> से क्षणभर में स्वयंसेवक परस्पर आत्मीय भाव से बंध जाते हैं. परम्परा का
> भेद और कुरीतियों का कलुष कट जाता है. प्रेम और एक दूसरे के प्रति समर्पण
> का भाव गहराई तक सृजित होता है.
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> कार्यक्रम के उपरांत स्वयंसेवक अपने समाज की उन बस्तियों में चले जाते
> हैं जो सदियों से वंचित एवं उपेक्षित हैं. वंचितों एवं उपेक्षितों के बीच
> बैठकर उनको भी रक्षा सूत्र बांधते और बंधवाते हुए हम उस संकल्प को
> दोहराते हैं जिसमें भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- समानम् सर्व भूतेषु. यह
> अभूतपूर्व कार्यक्रम है जब लाखों स्वयंसेवक इस देश की हजारों बस्तियों
> में निवास करने वाले लाखों वंचित परिवारों में बैठकर रक्षा बंधन के भाव
> को प्रकट करते हैं. विगत वर्षों के ऐसे कार्यक्रमों के कारण हिंदू समाज
> के अंदर एक्य एवं सामरस्य भाव-संचार का गुणात्मक परिवर्तन दिखाई दे रहा
> है. इसके पीछे संघ के इस कार्यक्रम की महती भूमिका है. भाव यही है कि
> सम्पूर्ण समाज, सम्पूर्ण समाज की रक्षा का व्रत ले. लोग श्रेष्ठ जीवन
> मूल्यों की रक्षा का व्रत लें. सशक्त, समरस एवं संस्कार संपन्न समाज ही
> किसी देश की शक्ति का आधार हो सकता है. इसी प्रयत्न में संघ लगा है.
> रक्षा बंधन का यह पर्व इस महाअभियान के चरणरूप में है.
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> (लेखक डा. कृष्ण गोपाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह हैं)

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